अँग्रेज़ी ने दूर किया पति से

Image caption ब्रिटेन में आकर बसने के मामले में क़ानून काफ़ी सख़्त कर दिए गए हैं

भारतीय मूल की एक गुजराती महिला ने ब्रिटेन के नए इमिग्रेशन कानून को चुनौती दी है.

नए क़ानून के तहत ब्रिटेन में लंबे समय तक रहने की अनुमति तभी मिल सकती है जबकि आवेदक को अँगरेज़ी भाषा आती हो.

इंग्लैंड के लेस्टर शहर में रहने वाली रशीदा चपटी ब्रितानी नागरिक हैं जबकि उनके पति गुजरात में एक गाँव में रहते हैं, अँगरेज़ी का ज्ञान न होने की वजह से उन्हें अपनी पत्नी के पास आने की अनुमति नहीं मिल रही है, रशीदा चपटी ने अदालत में गुहार लगाई है कि यह उनके मानवाधिकारों का हनन है.

रशीदा और वली चपटी की शादी अब से 37 साल पहले हुई थी और उनके छह बच्चे हैं, रशीदा के ज़्यादातर नज़दीकी रिश्तेदार लेस्टर शहर में रहते हैं.

54 साल की रशीदा ने अब ब्रिटेन की नागरिकता ले ली है और वो अपने पति वली चपटी को अपने पास बुलाना चाहती हैं लेकिन मगर हाल ही में लागू क़ानून उनकी राह में बाधा डाल रहा है. रशीदा कहती हैं कि उनके पति के लिए इस उम्र में अँगरेज़ी सीखना संभव नहीं है.

वे कहती हैं, "उनकी उम्र 58 वर्ष है, अब ये उम्र थोड़े ही अँगरेज़ी सीखने की. वे वहाँ नानकड़ा गाँव में रहते हैं वहाँ तो कोई अँगरेज़ी नहीं बोलता. बूढ़ा आदमी अब कैसे अँगरेज़ी सीखेगा, कोई नौजवान हो तो सीख भी सकता है, बुज़ुर्ग आदमी से ऐसी उम्मीद कैसे की जा सकती है".

सुनवाई पूरी

इस मामले पर हाइकोर्ट में सुनवाई हो चुकी है और इस पर फ़ैसला आने में अभी कुछ महीनों का समय लगेगा, इसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुक़दमा माना जा रहा है क्योंकि इमिग्रेशन और ह्यूमन राइट्स जैसे दो अहम मुद्दे आमने-सामने हैं, इस मुक़दमे का फ़ैसला आगे के लिए एक नज़ीर बनेगा.

इस मामले का राजनीतिक पहलू भी है, मौजूदा गठबंधन सरकार ने इस नए क़ानून को मंज़ूरी दी है और कई लोगों का कहना है कि हर हाल में अँगरेज़ी जानने की अनिवार्यता कुछ ज़्यादा ही सख़्त है.

रशीदा ने जब ब्रिटेन की नागरिकता ली थी तब यह क़ानून लागू नहीं था. रशीदा का समर्थन कर रहे लेस्टर से लेबर पार्टी के काउंसिलर मियाँ मयात का कहना है कि वली चपटी के लिए अँगरेज़ी सीखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है.

वे कहते हैं, "उन्हें अंगरेज़ी सीखने के लिए उन्हें लगभग 180 मील दूर जाना होगा क्योंकि वे गुजरात के एक गाँव में रहते हैं, उन्हें उम्र की वजह से अँगरेज़ी सीखने में जो कठिनाई होगी वह तो अलग है लेकिन इम्तहान पास करने लायक अँगरेज़ी सीखने के लिए जितनी फ़ीस देनी होगी वह उनकी सलाना कमाई से पंद्रह गुना अधिक होगी".

लेकिन सत्ताधारी कंज़रवेटिव पार्टी के सांसद डॉमिनिक रॉब रशीदा चपटी की दलील से सहमत नहीं हैं, उनका कहना है कि मानवाधिकार को एक हद से आगे खींचना सही नहीं है. बीबीसी के रेडियो फ़ोर से बातचीत में डॉमिनिक रॉब ने कहा, "ब्रिटेन आना एक अवसर है लेकिन अधिकार नहीं, उसके लिए कुछ ज़िम्मेदारियाँ पूरी करनी होती हैं और अँगरेज़ी सीखना उनमें से एक है, यह नियम बिल्कुल सही है, यह आने वाले व्यक्ति और हमारे समाज दोनों के लिए बेहतर है".

रशीदा चपटी की ओर से मुकदमे की पैरवी कर रहे वकील मनजीत गिल का कहना है यह रंगभेद और नस्लभेद की ही तरह भाषा के आधार पर भेदभाव का मामला है जिसमें पति पत्नी में से एक को तो ब्रिटेन में रहने की आज़ादी है और दूसरे को नहीं.

मुकदमे के फ़ैसले का असर हज़ारों लोगों पर हो सकता है जिनकी हालत चपटी परिवार जैसी है.

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