हादसों के शहर का...एक मसीहा

  • 29 अक्तूबर 2013
Image caption सालों पहले लगाई गई बारुदी सुरंगों की चपेट में जाने-अनजाने अक्सर बच्चे, बूढ़े और नौजवान भी आ जाते हैं.

देश की सरहदें, सेना के जवानों के अलावा कई ऐसे गुमनाम लोगों का बसेरा भी होती हैं जिनके लिए धमाकों की गूंज, गोलाबारी की आवाज़ और खतरों के साए में जीना रोज़मर्रा ज़िंदगी का एक हिस्सा है.

भारत-पाक सीमा से सटे कई इलाकों में बारुदी सुरंगों से होने वाले हादसे आम हैं...लेकिन इन हादसों के बीच एक शख्स ऐसा भी है जो इन लोगों के लिए उम्मीद की एक किरण बनकर उभरा है. पढ़िए जगबीर सिंह सुदान की कहानी उनकी अपनी ज़बानी.

'' मेरा बचपन सेना के कैंपो और गोलियों की आवाज़ों के बीच अपने फौजी पिता के साथ बिता. पिता ने देश के लिए लड़ते हुए अपनी एक टांग गंवा दी और उसके बाद शुरु हुआ ज़िंदगी का एक मुश्किल दौर. मैंने इस पहाड़ी इलाके की मुश्किल ज़िंदगी देखी और इस सच्चाई से भी रूबरू हुआ कि सरहद से सटे इलाकों में अक्सर आम लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है.

हादसे

सीमा से सटे होने के कारण दशकों पहले इस इलाके में बारुदी सुरंगे बिछाई गईं थीं. पेंसिल सेल की शक्ल लिए ये बारुदी सुरंगे न आसानी से दिखती हैं और न पहचान में आती हैं.

बारिश और पानी में बहकर ये बारुद खेतों, सड़कों, जंगलों में पहुंच जाता है और बच्चे, बूढ़े, नौजवान इसकी चपेट में आ जाते हैं. कई लोग चरमपंथी गतिविधियों और सीमा पार से होने वाली गोलीबारी का शिकार होकर भी अपाहिज हो जाते हैं.

इन हादसों में अपने हाथ-पैर गंवाने के बाद इन लोगों के पास दूसरों पर निर्भर ज़िंदगी जीने के अलावा कोई चारा नहीं होता. इन लोगों के पास न अस्पतालों का सहारा था न सरकार की तरफ से कोई मदद.

ऐसे में आज से 22 साल पहले मैंने हादसों के शिकार लोगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने और उनके पुर्नवास की पहल की.

इस दौरान मैंने ‘जयपुर फुट’ के बारे में सुना और वहां जाकर इसके बारे में जानकारी हासिल की.

लेकिन कृत्रिम अंग और उससे जुड़ा इलाज महंगा है और बड़े शहरों तक सीमित. यही वजह है कि इसके लिए हमें पैसों की ज़रूरत थी.

शुरुआत में कुछ दिक्कतें आईं लेकिन इस नेक काम में मेरी मदद के लिए समय के साथ कई लोग आगे आए.

इलाज

हमने जावेद जैसे कई लोगों को जयपुर और दिल्ली ले जाकर उनका इलाज कराया.

जावेद कहते हैं, ''साल 2000 में मैं और मेरा भाई आठवीं में पढ़ते थे और हम स्कूल से वापस आ रहे थे. तभी अचानक हमारा पैर एक बारूदी सुरंग पर पड़ गया और हमारी टांगे कट गईं. मेरी दांई टांग कटी और मेरे भाई की बांई टांग कट गई. इसके बाद हमने जगबीर जी की मदद से कृत्रिम पैर लगवाए.''

जावेद आज हमारे संगठन रका हिस्सा है और एक बार फिर उसी तरह चल फिर सकता है जिस तरह वो हादसे से पहले था.

मुहिम

मैं अब तक पांच हज़ार से ज़्यादा लोगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध करवा चुका हूं. ये कोशिश इन लोगों के लिए एक नई ज़िंदगी लेकर आई है.

अपनी इस कोशिश के ज़रिए मैंने सरहद पार पाकिस्तान से आए कुछ लोगों को भी अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद की है.

एलओसी पार तक भारत आने वाले लोगों में भी कई लोग इन हादसों के पीड़ित होते हैं. हम लोग इन्हें भी कई बार बिना किसी शुल्क कृत्रिम अंग उपलब्ध कराते हैं.

अब मेरी उम्र ढलने लगी है लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरी ये मुहिम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे.

इस लक्ष्य को पाने के लिए मेरी सबसे बड़ी पूंजी है हादसों से मुरझाए चेहरों पर दौड़ती खुशी की एक लहर.''

आम लोगों की बेमिसाल कोशिशों से जुड़ी ऐसी ही कोई कहानी आपके गांव आपके शहर या आपके आस-पास भी हो सकती है. अगर आप भी बदलाव के इन गुमनाम सिपाहियों की खबर हम तक पहुंचाना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें parul.agrawal@bbc.co.uk पर.

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