सीरिया के हमा शहर में कई लोग मारे गए

  • 31 जुलाई 2011
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Image caption सीरिया के हमा शहर में टैंकों के साथ सेना दाख़िल हुई

एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन का कहना है कि सीरिया के उत्तरी शहर हमा पर सरकारी टैंको से किए गए हमले में कम से कम 130 आम नागरिक मारे गए हैं.

पिछले एक महीने से हमा में विद्रोह चल रहा है और सेना ने उसकी नाकेबंदी कर रखी है.

शहर के नागरिकों ने बताया कि जब सेना कई तरफ़ से शहर में दाख़िल हुई तो भारी गोलीबारी सुनाई दी.

रमज़ान के महीने में विरोध प्रदर्शनों के बढ़ने के ख़तरे को देखते हुए शायद सेना ये संकेत देना चाह रही है कि व्यापक पैमाने पर विद्रोह सहन नहीं किया जाएगा.

सरकार के विरोधियों का कहना है कि मार्च के मध्य में शुरु हुए प्रदर्शनों में अब तक 1500 नागरिक और 350 सुरक्षा बल मारे जा चुके हैं.

लेकिन सरकार के दमन के बावजूद विरोध ठंडा नहीं पड़ रहा.

विरोध का केंद्र

हमा में मौजूद कार्यकर्ताओं का कहना है कि सेना और उसके टैंकों ने सुबह सवेरे हमला शुरु किया और वो स्थानीय लोगों द्वारा खड़ी की गई सैकड़ों रुकावटों को रौंदते हुए शहर के केंद्र में पहुंच गए.

एक डॉक्टर ने रॉएटर समाचार एजेंसी को बताया, "टैंक भारी मशीनगनों से गोलीबारी करते हुए सड़कों पर लगी बाधाओं को कुचल कर आगे बढ़ रहे हैं".

डॉक्टर ने बताया कि मरने वालों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हो रही है.

सीरियन ऑब्ज़र्वेटरी फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के रमी अब्दुल रहमान ने कहा कि सीरिया के डॉक्टरों से हुई बातचीत से पता चला है कि 45 लोग मारे गए हैं और कई अन्य घायल हुए हैं.

बीबीसी के संवाददाता जिम म्योर सुरक्षा बलों के निशानेबाज़ों ने ऊंची इमारतों पर जगह ले ली है.

सामूहिक गिरफ़्तारियां

मानवाधिकार कार्यकर्ता रमी अब्दुल रहमान के अनुसार रविवार को दक्षिणी दरा क्षेत्र के हराक शहर में सुरक्षा बलों के हाथों तीन लोग मारे गए और पूर्वी शहर दैर अल ज़ूर में छ लोग मारे गए हैं.

शनिवार को दैर अल ज़ूर में सेना ने पथराव कर रहे लोगों पर गोलियां चलाईं जिसमें तीन लोग मारे गए.

शुक्रवार को समूचे देश में जगह जगह हुए विरोध प्रदर्शनों ने दसियों हज़ार लोगों ने हिस्सा लिया और उनपर सेना की कार्रवाई में 20 लोग मारे गए और 35 घायल हुए.

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि जब से ये विद्रोह शुरु हुआ है अब तक 12,600 लोग गिरफ़्तार किए जा चुके हैं और 3,000 लापता हैं.

सरकार हथियारबंद इस्लामिक गिरोहों को इन उपद्रवों के लिए ज़िम्मेदार बताती है जबकि पत्रकारों का कहना है कि आमतौर पर सारे विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे हैं.

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