हमा शहर में घुसे सरकारी सेना के टैंक

  • 3 अगस्त 2011
सीरिया में टैंक इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption सीरियाई सेना के टैंक हमा शहर में अंदर तक प्रवेश कर गए हैं

सीरिया में सरकारी सेना के टैंक विरोधियों के प्रदर्शनों को दबाते हुए हमा शहर में काफ़ी अंदर तक प्रवेश कर गए हैं.

रॉयटर्स समाचार एजेंसी से बात करने वाले स्थानीय नागरिकों ने बताया कि टैंक शहर के बीच में बने ओरोंटेस चौक तक पहुँच गए. वही चौक राष्ट्रपति बशर अल-असद के विरुद्ध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने सीरिया में हो रहे ख़ून-ख़राबे की कड़ी आलोचना की है मगर सुरक्षा परिषद में इस मसले पर मतभेद हैं.

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि रविवार से सीरिया में 140 लोगों की मौत हो चुकी है और उनमें से अधिकतर लोग हमा में ही मारे गए हैं. इस तरह मार्च से लेकर अब तक कुल 1600 आम नागरिक मारे गए हैं.

सीरिया में अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के प्रवेश पर प्रतिबंध है जिस वजह से प्रत्यक्षदर्शियों और विपक्षी कार्यकर्ताओं के ज़रिए ही ब्यौरा मिल पा रहा है.

शहर में तबाही

सुबह से ही सशस्त्र वाहनों के हमा शहर की ओर बढ़ने की ख़बरें मिल रही थीं जिससे गोलीबारी की आवाज़ें सुनी जा सकती थीं.

हमा के एक नागरिक ने सैटेलाइट फ़ोन के ज़रिए रॉयटर्स को बताया, "सीरिया का प्रशासन होस्नी मुबारक पर लगे मीडिया के ध्यान का फ़ायदा उठाकर हमा शहर में विरोध को ख़त्म कर देना चाहता है."

ख़बरों के अनुसार तो इस हफ़्ते गोले रिहायशी इलाक़ों पर भी गिरे हैं जहाँ कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहे थे. भारी गोलीबारी के बीच वहाँ के लोगों को पनाह लेने इधर-उधर भागना पड़ा.

कूटनीतिक कोशिशें

उधर सुरक्षा परिषद में मंगलवार को इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं हो सका और फिर इस पर बहस होने की संभावना है. सीरिया मध्यपूर्व का एक कूटनीतिक दृष्टि से अहम देश है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये चिंता बनी हुई है कि सीरिया गृह युद्ध की ओर जा चुका है.

ऐसे में पश्चिमी देश राष्ट्रपति असद की कार्रवाई की आलोचना करते हुए एक प्रस्ताव पारित करने की कोशिश कर रहे हैं.

विवाद इस पर है कि ये प्रस्ताव एक औपचारिक प्रस्ताव होना चाहिए या फिर अनौपचारिक.

संयुक्त राष्ट्र में रूस के दूत विताली चुरकिन का कहना है कि पश्चिमी देशों की ओर से रखे गए मौजूदा प्रस्ताव की भाषा शांति प्रयासों को नुक़सान पहुँचाएगी.

चीन के अलावा भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका जैसे देश सीरिया पर सुरक्षा परिषद की कार्रवाई के विरोध में हैं क्योंकि उनके मुताबिक़ इससे लीबिया पर अंतरराष्ट्रीय सेना की कार्रवाई जैसी स्थिति बन सकती है.

मगर ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल और अमरीका को लगता है कि राष्ट्रपति असद को कड़ा संदेश देने के लिए एक औपचारिक भाषा ही होनी चाहिए.

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