साँगे तिब्बत की निर्वासित सरकार के नए 'प्रधानमंत्री'

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Image caption तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लौबसैंग साँगे

हार्वर्ड में पढ़े 43 वर्षीय लौबसैंग साँगे को तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई है. अब वह तिब्बत आँदोलन के राजनीतिक नेता के तौर पर दलाई लामा का स्थान लेंगे.

तिब्बत की राजनीति में धार्मिक वर्चस्व को समाप्त करते हुए साँगे मई में 76 वर्षीय दलाई लामा के कामों का दायित्व सँभालेंगे.

दलाई लामा आध्यात्मिक गुरू की अपनी भूमिका निभाते रहेंगे और महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों पर उनकी पकड़ भी बरक़रार रहेगी लेकिन साँगे का महत्व पहले की तुलना में काफ़ी बढ़ जाएगा.

उनके सामने काफ़ी चुनौतियां होंगी लेकिन वह अब तक निर्वासित सरकार के बाहर अपनी पहचान नहीं बना पाए हैं.

सार्वजनिक तौर पर उन्होंने दलाई लामा की चीनी शासन के अंतर्गत तिब्बत के लिए ‘अर्थपूर्ण स्वायत्तता’ की नीति का समर्थन किया है लेकिन उनकी उम्र और स्वाधीनता समर्थक तिब्बत युवा कॉंग्रेस की उनकी पूर्व सदस्यता से इन अटकलों को बल मिला है कि वह दलाई लामा की तुलना में कहीं ज़्यादा स्वच्छंद नीतियां अपना सकते हैं.

शपथ गृहण समारोह धर्मशाला में हुआ जो तिब्बत की निर्वाचित सरकार का मुख्यालय है.

'भारत तिब्बत मुद्दे को उठाए'

इस समारोह की अध्यक्षता दलाई लामा ने की. ठीक नौ बजकर नौ मिनट के नौ सेकेंड बाद साँगे ने चाय और मीठे चावल का भोग चढ़ा कर अपने पद की शपथ ली.

साँगे का जन्म दार्जिलिंग के आसपास के इलाके में हुआ था. वहीं वह पले बढ़े. दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के बाद उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल से मास्टर्स की डिग्री ली. इसके बाद से वह अमरीका में रहने लगे.

साँगे को अप्रैल में प्रधानमंत्री चुना गया था तब उन्हें 49000 निर्वासित तिब्बतियों के 55 फ़ीसदी वोट मिले थे.

इस निर्वासित सरकार को किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी है. चीन इसको स्वीकार नहीं करता है और दलाई लामा के संरक्षण के बिना तिब्बतवासियों की नज़र में भी इसकी वैधता पर सवाल उठाए जा सकते हैं.

पीटीआई को दिए गए एक इंटरव्यू में लौबसैंग साँगे ने कहा है कि चीन के साथ बातचीत में भारत को तिब्बत को एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उठाना चाहिए.

जब उनसे यह पूछा गया कि तिब्बत मुद्दे के समाधान के लिए क्या वह चीनी नेतृत्व से मिलना चाहेंगे तो उनका कहना था कि वह उनसे मिलने के लिए हर समय तैयार हैं लेकिन चीनी नेतृत्व ने ऐसा करने की कोई तत्परता नहीं दिखाई है.

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