लाल क़िले के हमलावर को मृत्युदंड

  • 10 अगस्त 2011
लालक़िला

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के लाल क़िले में फ़ौजी बैरेकों पर हमला करने वाले पाकिस्तानी नागरिक अशफ़ाक़ आरिफ़ को मौत की सज़ा बरक़रार रखने का फ़ैसला किया है.

लश्करे तैयबा नाम के चरमपंथी संगठन से जुड़े आरिफ़ को दिसंबर 2000 में लाल क़िले पर हमला करने का दोषी पाया गया था.

इस हमले में तीन लोग मारे गए थे. आरिफ़ को निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी और 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस सज़ा की पुष्टि की थी.

आरिफ़ को उनकी पत्नी रहमाना यूसुफ़ फ़ारुक़ी के साथ हमले के चार दिन बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था.

उन्हें हत्या, आपराधिक षडयंत्र और भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का दोषी पाया गया था.

हमला

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Image caption अशफ़ाक़ आरिफ़ को भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का दोषी पाया गया.

पुलिस ने कहा था कि 22 दिसंबर, 2000 की रात को दो चरमपंथी लाल क़िले में घुसे. उन दिनों वहाँ फ़ौजी बैरकें हुआ करती थीं.

चरमपंथियों ने सेना आपूर्ति डिपो पर हमला करके दो सैनिकों और एक गार्ड को मार डाला था. निचली अदालत ने आरिफ़ और छह दूसरे अभियुक्तों को अक्तूबर 2005 में सज़ा सुनाई थी.

लेकिन सिर्फ़ आरिफ़ को ही मृत्युदंड दिया गया था. बाक़ी अभियुक्तों को अलग अलग मियाद की क़ैद हुई थी.

तनाव

हाईकोर्ट ने भारत-प्रशासित कश्मीर में रहने वाले नज़ीर अहमद क़ासिद और उनके बेटे फ़ारुख़ अहमद क़ासिद के ख़िलाफ़ निचली अदालत के नतीजों को ख़ारिज कर दिया.

बाबर मोहसिन बाग़वाला, सदाक़त अली और मतलूब आलम को हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था.

पुलिस ने इन तीनों पर अशफ़ाक़ आरिफ़ को पनाह देने का आरोप लगाया था.

पाकिस्तान के चरमपंथी संगठन लश्करे तैयबा ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी, जिसके बाद भारत-पाक संबंधों तनावपूर्ण हो गए.

दिसंबर 2003 में लाल क़िले से सैनिक बैरेकों को हटा लिया गया था. अब भारतीय पर्यटन मंत्रालय इसकी देख रेख करता है.

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