अपनी ज़मीन नहीं माँग पाएँगे किसान

  • 11 अगस्त 2011
मायावती
Image caption भूमि अधिग्रहण के मामलों में मायावती की काफ़ी आलोचना हुई है.

उत्तर प्रदेश विधान मंडल के दोनों सदनों ने आज क़ानून में बदलाव करके किसानों का यह अधिकार ख़त्म कर दिया कि वह अधिग्रहण के पाँच साल तक इस्तेमाल न होने पर अपनी ज़मीन वापस माँग सकें.

इसके लिए उत्तर प्रदेश नगर योजना और विकास कानून 1973 की धारा 17 में संशोधन किया गया.

ख़ास बात यह है कि यह संशोधन विधेयक दोनों सदनों में बिना चर्चा पारित हुआ , क्योंकि विपक्ष उस समय दूसरे मुद्दे पर हंगामा कर रहा था .

अब विधेयक राज्यपाल के अनुमोदन के लिए जाएगा.

जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जो संशोधन किया है वह केन्द्रीय कानून के ख़िलाफ़ है. इसलिए इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है.

वर्तमान क़ानून में राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह नगर विकास अथवा किसी अन्य उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण क़ानून 1894 के तहत भूमि अधिग्रहण कर सकेगी.

अधिकार ख़त्म

Image caption उत्तर प्रदेश में अपनी ज़मीन बचाने के लिए किसान आंदोलित हैं.

लेकिन वर्तमान क़ानून में भूमि के मालिक को भी यह अधिकार है कि अगर पाँच वर्ष के अंदर उसकी भूमि का निर्धारित उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता तो वह अपनी ज़मीन वापस माँग सकता है.

अब मायावती सरकार ने क़ानून में बदलाव कर भूमि मालिक के इस अधिकार को समाप्त कर दिया है.

लेकिन विपक्षी दलों ने इस संशोधन को किसान विरोधी ओर केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण क़ानून के खिलाफ बताया है.

विपक्ष ने कहा था कि वह सदन में इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेगा. लेकिन इसकी नौबत नहीं आई.

कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी समाजवादी पार्टी के सदस्य पशुपालन मंत्री अवध पाल सिंह यादव के इस्तीफ़े की माँग करते हुए हंगामा करने लगे.

विधानसभा अध्यक्ष ने हंगामा शांत करने की कोशिश की लेकिन जब विपक्ष ख़ामोश नहीं हुआ तो शोरशराबे के दौरान ही सरकार की ओर से एक एक करके एजेंडा के सभी विषय रखे गए और उन्हें ध्वनिमत से पारित कर दिया गया.

इसके बाद इसी तरह के माहौल में विधान परिषद में भी यह विधेयक पारित हो गया.

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