सवा करोड़ लोगों के पास नागरिकता नहीं

  • 25 अगस्त 2011
बर्मा के शरणार्थी इमेज कॉपीरइट BBC World Service

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि दुनिया में क़रीब एक करोड़ बीस लाख लोग ऐसे हैं जिनके पास किसी देश की नागरिकता नहीं है और इसकी वजह से वे मानवाधिकारों से महरूम हैं.

संस्था का कहना है कि ये स्थिति लगातार ख़राब होती जा रही है क्योंकि ये नागरिकता विहीन लोगों के बच्चों का मामला भी सामने आ रहा है.

ये समस्या दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया, पश्चिमी यूरोप, मध्य पूर्व और अफ़्रीका में सबसे अधिक है.

लोगों के पास नागरिकता न होने की कई वजहें हो सकती हैं. जिनमें देश का विभाजन, जैसा कि सोवियत संघ और युगोस्लाविया का हुआ या फिर औपनिवेशी शासन के ख़त्म होने के बाद नए देश का निर्माण, जैसा कि अफ़्रीका और एशिया में हुआ.

परेशानी

शरणार्थी मामलों की संयुक्त राष्ट्र समिति (यूएनएचसीआर) के उच्चायुक्त एंटोनियो गटरेस का कहना है, "इन लोगों को तत्काल सहायता की ज़रुरत है क्योंकि वे एक ऐसे क़ानूनी अनिश्चितता में रह रहे हैं जो किसी दु:स्वप्न की तरह है."

उनका कहना है, "ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ व्यक्तिगत तौर पर लोग ये सब झेल रहे हैं इसकी वजह से एक पूरे समुदाय की कई पीढ़ियाँ हाशिए पर पड़ी हुई हैं. इसकी वजह से उस समाज पर दबाव तो पड़ता ही है, जिसमें वो रह रहे हैं, इससे कई बार संघर्ष की स्थिति भी पैदा हो रही है."

नागरिकता न होने की वजह से देशविहीन लोगों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इसमें संपत्ति न ख़रीद पाना, बैंक एकाउंट न खोल पाना, वैधानिक रुप से विवाह न कर पाना और अपने बच्चों के जन्म का पंजीकरण न करवा पाना शामिल है.

कुछ लोग को महज़ इसलिए लंबे समय तक हिरासत में रहना पड़ा क्योंकि वे ये नहीं बता पाए कि वे कौन हैं और वे किस देश के निवासी हैं.

'शर्मनाक'

संयुक्त राष्ट्र ज़ोर दे रही है कि ऐसे नागरिकता विहीन लोगों के लिए तैयार दो समझौतों पर ज़्यादा से ज़्यादा देशों को शामिल होना चाहिए.

वर्ष 1954 में नागरिकता विहीन लोगों के लिए हुए समझौते पर अब तक सिर्फ़ 66 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं. जबकि ऐसे लोगों को क़ानूनी वैधता प्रदान करने के लिए वर्ष 1961 में किए गए समझौते पर सिर्फ़ 38 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं.

गटरेस का कहना है, "50 वर्ष बाद इन समझौतों ने गिनती के ही देशों को आकर्षित किया है."

उनका कहना है, "ये शर्मनाक है कि लाखों लोग बिना नागरिकता के रह रहे हैं, जो एक मूलभूत मानवाधिकार है."

वैसे यूएनएचसीआर का कहना है कि हाल के महीने में क्रोएशिया, पनामा, फ़िलिपीन्स और तुर्कमेनिस्तान ने इनमें से एक या दोनों समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं.

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