'मुसलमानों की निगरानी की जाँच हो'

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न्यूयॉर्क में रहने वाले बहुत से मुसलमान अमरीका सरकार से पुलिस और अमरीकी गुप्तचर संस्था सीआईए द्वारा मुसलमानों की खुफ़िया निगरानी करने के मुद्दे पर जांच की मांग कर रहे हैं.

यह माँग एक अमरीकी समाचार एजेंसी की एक रिपोर्ट के बाद की जा रही . इसमें कहा गया है कि 11 सितंबर 2001 के चरमपंथी हमलों के बाद से ही न्यूयॉर्क की पुलिस और सीआईए ने मिलकर हमले रोकने के मकसद से खुफ़िया तौर पर मुसलमानों, उनकी मस्जिदों और अन्य स्थानों की जासूसी और निगरानी की.

पिछले हफ़ते छपी वाली इस रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस प्रकार मुसलमानों के बीच में मुस्लिम खुफ़िया एजेंटों को छोड़ा गया है जो मुस्लिम समुदाय और लोगों के बारें में जासूसी करके विस्तृत जानकारी दें.

इस रिपोर्ट के आने के बाद न्यूयॉर्क में रहने वाले बहुत से मुसलमान नाराज़ और परेशान हैं. अब वह अमरीकी सरकार से मांग कर रहे हैं कि न्यूयॉर्क पुलिस विभाग और सीआईए पर इस तरह की ग़ैरकानूनी जासूसी करने के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाए.

अमरीका के एक मुस्लिम संगठन काउंसिल ऑन अमेरिकन इसलामिक रिलेशंस के ग़दीर अब्बास कहते हैं कि सीआईए की अमरीकियों पर जासूसी करना गैरकानूनी है.

वह कहते हैं, “सीआईए ने 1981 में राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन द्वारा बनाए गए उस कानून का उल्लंघन किया है जिसमें सीआईए को अमरीकी शहरियों की जासूसी करने पर पाबंदी लगाई गई है. अगर इस प्रकार खुफ़िया तौर पर बनाई गई पुलिस रिपोर्टों को सीआईए और एफ़बीआई प्रयोग करते हैं तो वह भी ग़ैरकानूनी है. अब सरकार इसकी पूरी जांच कराए क्यूंकि अमरीकी मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों का हनन हुआ है.”

'शक की नज़र'

ग़दीर अब्बास ने कहा है कि इस तरह खुफिया तौर पर पूरी मुसलमान कौम पर नज़र रखने की नीति से यह संदेश जाता है कि पूरे समुदाय को ही शक की नज़र से देखा जाता है. और यह भी कि अमरीकी संविधान के तहत जो अधिकार मिले हैं उनको बिना रोक टोक रौंदा जा सकता है.

ये रिपोर्ट कई महीने की छानबीन और खुफ़िया कार्यक्रम से जुड़े बहुत से पुलिसवालों से इंटरव्यू करने के बाद बनाई गई है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सीआईए के एक पूर्व अधिकारी डेविड कोहन की निगरानी में न्यूयॉर्क पुलिस विभाग में खुफ़िया विभाग बनाया गया जिसको सीआईए से मदद मिलती है.

रिपोर्ट के मुताबिक इस कार्यक्रम के तहत मुसलमानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के हर पहलू पर खुफ़िया नज़र रखी जा रही है.

चाहे वह मस्जिद में पेश इमाम के खुतबे हों या रेस्टोरंट और इंटरनेट कैफ़े के साथ-साथ किताब की दुकानें हों या फिर नाईटक्लब्स, सभी जगह साआईए के प्रशिक्षित खुफ़िया पुलिसवाले मुसलमानों पर नज़र रखते हैं.

मस्जिदों के इमाम के साथ साथ मुसलमान टैक्सी ड्राईवरों और खाने के खोम्चे लगाने वालों के बारे में भी खुफ़िया तौर पर पूरी जानकारी इकट्ठा की जाती हैं. और इसके लिए मुसलमान अफ़सर को ही तैनात किया जाता है.

'सुरक्षा के लिए ज़रूरी'

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वैसे 11 सितंबर के हमलों के बाद से पुलिस विभाग ने मुसलमानों से बराबर यह अपील की कि वह चरमपंथ के खतरे से निपटने के लिए पुलिस के साथ सहयोग करें. और इसके लिए खासकर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते रहे हैं जिसमें पुलिस और एफ़बीआई के साथ मुसलमानों की मुलाकातें होती रही हैं.

लेकिन बहुत से मुसलमान इस तरह खुफ़िया तौर पर जासूसी का शिकार बनाए जाने से बेहद नाराज़ हैं. आएशा अल-अदविया एक मुस्लिम महिला हैं जो विमेन इन इसलाम नामक एक संस्था की निदेशक हैं. आएशा ने हाल ही में न्यूयॉर्क के पुलिस कमिश्नर रेमंड कैली की एक इफ़्तार पार्टी में शिरकत की थी.

वह उस पार्टी का समां बयान करते हुए कहती हैं, “मैने पुलिस कमिशनर रेमंड कैली को हाल की एक इफ़तार पार्टी में देखा कि वह बड़े जोश से एक मस्जिद के इमाम को गले लगा रहे थे और उन्हें मुबारकबाद दे रहे थे. और फिर मैं अब यह खबर सुन रही हूं कि पुलिस हमारी जासूसी कर रही है, तो मुझे बहुत अफ़सोस हो रहा है और गुस्सा भी आ रहा है कि हमारे ही पुलिस विभाग ने हमारे साथ छल किया.”

लेकिन न्यूयॉर्क के मेयर माईकल ब्लूमबर्ग समेत कई अधिकारी मानते हैं कि पुलिस कानून के अंदर रहते हुए ही कार्रवाई करती है जो आम लोगों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी हैं.

एक पुलिस अफ़सर मोरदेकाई ज़ीकांस्की, जो अब रिटायर हो चुके हैं, ने समाचार एजेंसी एपी से कहा है कि ऐसे कार्यक्रम जारी रहने चाहिए.

वह कहते हैं,“यह मुसलमानों को चुनकर भेदभाव करने का सवाल नहीं है. यह तो सिर्फ़ उस जगह जाने की बात है जहां कोई समस्या है. और हम खुशनसीब हैं कि हमारे साथ कुछ ऐसे पुलिस अफ़सर हैं जो कई भाषाएं बोलते हैं और विभिन्न समुदाय से आते हैं, यह तो हमारे लिए छुपा हुआ हथियार है.”

लेकिन कुछ मुसलमानों का यह भी कहना है कि पुलिस विभाग उनसे दोमुही बातें करता रहा है. फ़हद अहमद पाकिस्तानी मूल के अमरीकी हैं जो देसीज़ राईज़िंग अप ऐंड मूविंग या ड्रम नामक एक मानवाधिकार संस्था के निदेशक हैं. और उनकी संस्था ने बहुत से मुसलमान लोगों की पुलिस मामलों में भी मदद की है.

वह कहते हैं,“जब भी कोई छोटी मोटी बात निकलती है तो पुलिस विभाग से संपर्क करते हैं, तो वह कभी जवाब देते हैं, कभी कोई अफ़सर भेज देते हैं तो कभी कोई खत भेजकर मामला दबा देते हैं. लेकिन कभी सही तरीके से जवाब नहीं देते. तो हम लोग तो जानते हैं कि पुलिस बात एक करती है और काम कोई और करती रहती है. अब इस भांडाफोड़ के बाद सबको पता चला है कि पुलिस और सीआईए मिलकर किस तरह की नीति अपना रहे हैं हमारे समुदाय के खिलाफ़.”

फ़हद कहते हैं कि इस सारे मामले में पारदर्शिता लाई जानी चाहिए कि पुलिस किस प्रकार जनता के टैक्स का पैसा खर्च कर रही है.

रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया है कि इस सारे खुफ़िया कार्यक्रम के बारे में स्थानीय प्रशासन और केंद्र सरकार तक को मालूम नहीं था.

पुलिस विभाग ने एक लिखित बयान जारी करके इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज किया है. विभाग का कहना है कि न्यूयॉर्क वासियों की सुरक्षा के लिए जो भी कानूनी तौर पर जायज़ कदम हैं वह उठाए जाते रहेंगे.

लेकिन पुलिस कमिशनर रेमंड कैली ने यह ज़रूर क़बूल किया है कि सीआईए का एक अधिकारी न्यूयॉर्क में पुलिस मुख्यालय में ही काम करता है और पुलिस को सलाह भी देता है.

अब कुछ मुसलमानों की यह भी मांग है कि अमरीकी संसद इस पूरे मामले की गहन छानबीन कराए.