दस साल बाद अमरीका कितना सुरक्षित होगा?

  • 9 सितंबर 2011
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Image caption अरब जगत के आंदोलनों से मध्य-पूर्व से अमरीका के रिश्ते सुधरे

दस साल पहले अमरीका पर हुए भीषण चरमपंथी हमले ने दो लड़ाइयों का मार्ग प्रशस्त किया और साथ ही वैश्वित तनाव को और बढ़ाया. ऐसे में अमरीका के पूर्व उप विदेश मंत्री पीजे क्राउली सवाल करते हैं कि 2021 में दुनिया कितना सुरक्षित महसूस करेगी?

सितंबर 2001 के हमलों के दस साल बाद ओसाबा बिन लादेन की मृत्यु हो गई है, उनके ज़हरीले धार्मिक दर्शन को आमतौर पर अस्वीकार कर दिया गया है और उनका संगठन अल क़ायदा लगातार दबाव में है.

हालांकि अल क़ायदा अभी भी चरमपंथी हमले करने में सक्षम है, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि अब वो 11 सितंबर जैसे बड़े हमले को अंजाम दे सकता है.

अल क़ायदा और उसके सहयोगी संगठन ख़त्म हो जाएंगे या ख़तरनाक और प्रासंगिक बने रहेंगे, ये कई बातों पर निर्भर करेगा. यहां तीन बातें अहम हैं: पहला, इस्लाम के भीतर जारी विमर्श की दिशा क्या है; दूसरा, मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में सत्ता परिवर्तन के लिए चलाए गए आंदोलन का क्या महत्व है; और तीसरा, वित्तीय संकट के बावजूद सुरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयास और ये समझ लेना कि ख़तरा अभी टला नहीं है.

अल क़ायदा

पिछले दशक में आधुनिक विश्व में धर्म के अभिप्राय और व्यवहार को लेकर मुस्लिम जगत में लगातार चर्चा होती रही है. मुस्लिम जगत की ज़्यादातर आबादी ने इस दौरान अल क़ायदा के हिंसक तरीक़ों को नकार दिया है.

उन्होंने ये मसहूस किया है कि असल में अल क़ायदा की गतिविधियों के प्रारंभिक शिकार वे लोग ही रहे हैं.

मुसलमानों ने ये जान लिया है कि अल क़ायदा ने केवल चार विमानों का ही अपहरण नहीं किया बल्कि उनके धर्म को भी अगवा कर लिया और अब वो इसे सुधारने में जुट गए हैं. ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया में सत्ता परिवर्तन के लिए जो आंदोलन चलाए गए, उनसे अल क़ायदा के अप्रासंगिक होने का संकेत मिलता है.

सीरिया, यमन और बहरीन में जिस तरह राजनीतिक सुधारों को लेकर लोग सड़कों पर उतरे उससे पता चलता है कि मुस्लिम समाज में बदलाव आ रहा है और अल क़ायदा की इसमें कोई भूमिका नहीं.

हिंसक राजनीतिक अतिवाद के ख़तरों को कम करने की जगह ऐसे आंदोलनों का समर्थन करना बेहतर विकल्प होता है.

इन देशों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अवसरों को बढ़ाने के लिए बाहर से समर्थन की ज़रूरत है. पढ़ी-लिखी और एक-दूसरे से अच्छी तरह जुड़ी आबादी जिसमें 25 साल से कम उम्र के युवकों की अच्छी तादाद हो - उन्हें अब आश्वासन से ज़्यादा नौकरियों की ज़रूरत है. अमरीका और यूरोप में बड़े पैमाने पर मौजूद बेरोज़गारी की स्थिति में मध्य-पूर्व में नौकरियों के सृजन का समर्थन करने के लिए बड़ी राजनीतिक समझ चाहिए.

सरकारी ख़र्च कम करने और बजट घाटे को ख़त्म करने के दबाव की स्थिति में पश्चिमी ताक़तों के लिए ये आसान विकल्प है कि ओसामा बिन लादेन की मौत को ही जीत मान लिया जाए और पीछे हट जाया जाए जैसा शीत युद्ध के बाद किया गया था.

पिछले दस सालों में चरमपंथी ख़तरों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण बदला है और इसका मुक़ाबला करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और समन्वय में भी बदलाव आया है. ख़ुफ़िया तंत्र में सुधार हुआ है, चरमपंथी या तो मारे गए हैं या क़ैद कर लिए गए हैं, उनकी ज़्यादातर सुरक्षित पनाहगाहों को बंद कर दिया गया है, सीमा पर सुरक्षा मज़बूत हुई है और उनको मिलने वाली आर्थिक मदद काट दी गई है.

हमारी सुरक्षा तैयारी 10 साल पहले के मुक़ाबले काफ़ी बेहतर हुई है लेकिन चुनौती अभी ख़त्म नहीं हुई है.

भविष्य से उम्मीदें

मध्य पूर्व में आर्थिक और राजनीतिक सुधारों को पश्चिम की आर्थिक बहाली से जोड़कर देखें तो ऐसा नहीं है कि मध्यपूर्व में अगर सुधार होंगे तो पश्चिम की अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर ही होगा. इन सुधार आंदोलनों का समर्थन करना कभी भी सैन्य कार्रवाई करने से किफ़ायती विकल्प है.

इराक़ में अमरीकी नेतृत्व वाले अभियान में 800 अरब डॉलर का ख़र्च आया था. अगर भविष्य में किसी देश में सैनिक हस्तक्षेप की ज़रूरत होती है तो हाल ही में लीबिया में नैटो के नेतृत्व वाली सेना की जो सीमित भूमिका रही, वैसा ही मॉडल भविष्य में भी अपनाया जाना चाहिए.

सीख

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Image caption लीबिया की लड़ाई एक आदर्श साबित हो सकती है - क्राउली

ऐसे में आनेवाले दशक में हमें क्या कुछ हासिल करने की उम्मीद करनी चाहिए ?

आदर्श स्थिति तो ये होगी कि 2011 और 2012 में ट्यूनिशिया, मिस्र और लीबिया में चुनाव हों और प्रतिनिधि सरकारें चुनी जाएं जो कि अर्थपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सुधारों की शुरुआत करें.

जिस तरह के सुधार आंदोलन इन देशों में चलाए गए, आनेवाले दशक में वे दुसरे देशों में भी चलाए जाएं, राजनीतिक सत्ता हासिल की जाए न कि वो विरासत में मिले और सत्ता का शांतिपूर्व हस्तांतरण हो. एक आयोग का कहना है कि अमरीका पर दोबारा हमले हो सकते हैं.

पिछले दशक में हमने कई शहरों में चरमपंथी हमले देखे हैं जिनमें आत्घाती हमलावरों और ट्रक बमों का इस्तेमाल किया गया. यहां तक कि कंप्यूटर वायरस के ज़रिए क्षति पहुंचाने की कोशिश की गई.

लेकिन 9/11 के बाद हमारी तैयारी बेहतर है. अब हम चरमपंथी हमलों का डटकर मुक़ाबला करते हैं, सदमे से जल्दी उबर जाते हैं. हम राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों में नहीं उलझते और कड़ी प्रतिक्रियाओं से भी बचते हैं.

अब हमने सही सबक सीख लिया है.

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