क्या प्रताड़ना कभी सही हो सकती है?

ग्वांतानामो

ग्यारह सितंबर के हमलों को हुए 10 साल हो चुके हैं. एक ऐसा त्रासदीपूर्ण दिन, जिसने अमरीका के साथ-साथ पूरी दुनिया को बदल कर रख दिया.

अमरीका पर हुए हमले ने इस पर बड़ी बहस छेड़ दी कि कैसे सभ्य समाज को अपने दुश्मनों के साथ व्यवहार करना चाहिए और क्या प्रताड़ना कभी सही ठहराई जा सकती है?

मैंने सीआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी से ये पूछा था कि ग्वांतानामो बे जेल और ऐसे ही स्थानों पर जो हो रहा है, वे उसके बारे में क्या सोचते हैं.

वर्ष 2001 में फिल मड सीआईए के अंतर्गत ऑफ़िस ऑफ़ द टेरेरिज्म एनालिसिस में उप निदेशक थे. उन्होंने बताया था कि कैसे वे हर रात सीआईए के निदेशक को ख़तरे के बारे में जानकारी देते थे.

उन्होंने बताया था, "हम शुक्रवार की रात को भी बैठे रहते थे. हम जानते थे कि हम फिर से डिनर मिस करने जा रहे हैं. अपने परिवार या मित्रों के साथ बाहर जाना भी मिस कर रहे हैं. ये सब समझते हुए. इस बीच हमें एक क़ैदी की जानकारी मिलती थी. मैं नहीं जानता कि अगले दिन क्या होगा. लेकिन हम इस क़ैदी से जल्दी से जल्दी जानकारी हासिल करना चाहते थे."

भ्रम

उस समय उस अधिकारी के दिमाग़ में यही बात थी कि शायद एक और बच्चा मर जाएगा, शायद और माता-पिता मर जाएँगे. जल्दबाज़ी की भावना संतुलित होती थी, हालाँकि हम जानते थे कि ये तकनीक संवेदनशील है और एक न एक दिन ये सामने ज़रूर आएगी. किसी को इस व्यवस्था को लेकर भ्रम नहीं था कि ये हमेशा के लिए रहस्य बना रहेगा.

और ऐसा हुआ भी नहीं. जो चीज़ प्रकाश में आई, वो था अमरीकी न्याय मंत्रालय का मेमो, जिसमें तर्क दिया गया कि वैसे तो अमरीकी क़ानून के तहत प्रताड़ना ग़ैर क़ानूनी है, लेकिन सूचना हासिल करने के लिए पीड़ा पहुँचाना प्रताड़ना नहीं.

इसमें कहा गया- कुछ कार्रवाई क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक हो सकती है, फिर भी उस स्तर की पीड़ा नहीं पहुँचाती, जिससे उसे प्रताड़ना कहा जा सके.

मेमो के मुताबिक़- पीड़ा को उस अत्यधिक स्तर का होना चाहिए, जो गंभीर शारीरिक चोट और अंगों की ख़राबी के बराबर हो.

फिल मड को राष्ट्रपति ओबामा का ख़ुफ़िया उप मंत्री के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन फिर नामांकन हटा लिया गया. क्योंकि वो पिछली सरकार के समय पूछताछ की तकनीक के बारे में जानते थे.

मड ये भी जानते थे कि क्या हो रहा था. मड कहते हैं, "कोई भी चीज़ प्रताड़ना को सही नहीं ठहरा सकती. कोई भी चीज़ नहीं. इस पर सवाल क़ायम है कि उचित क्या है. उदारहण के लिए किसी पर एक सीमा तक दबाव बनाना, जो एक बच्चे की जान बचा सके. लेकिन अब इसके बारे में सोचिए. आप किसी पर एक सीमा तक दबाव बनाते हो और एकाएक वे नहीं जानते कि आगे क्या होने जा रहा है. वे हताश हो जाते हैं और फिर आपसे कहते हैं कि वे एक साज़िश के बारे में बताएँगे. तो क्या ये उचित है, वैध है और क्या ये प्रताड़ना है?"

प्रताड़ना

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Image caption अमरीका पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगे हैं

मड का कहना है कि तकनीकी रूप से कुछ मामलों में ये प्रताड़ना है, क्योंकि ये एक क़ैदी के ख़िलाफ़ शारीरिक आक्रामकता है.

उन्होंने बताया कि जब उन्होंने न्याय मंत्रालय से पूछा तो उन्होंने ये कहा कि ये संविधान के तहत पूर्ण रूप से वैध है. हमारा लक्ष्य किसी को पीड़ा पहुँचाना नहीं था. हमारा लक्ष्य लोगों को ये समझाना था कि उन्हें बोलना चाहिए.

मड का कहना था कि इन सबके बीच उनका सवाल और व्यापक है और ये मूल्यों के बारे में है.

वे कहते हैं- आप उन चीज़ों को सीमित करें, जो हमने किया. किसी को एक सीमा पर दबाव बनाना या कोई सूचना नहीं....आप क्या कहोगे? क्या ये सही है?

मड के मुताबिक़ अमरीकी लोगों को वो सब अच्छा नहीं लगा, जो उन्होंने किया.

उन्होंने कहा- मैं सात-आठ साल पहले हुई घटना के ख़िलाफ़ तर्क दूँगा. उस समय दुनिया उत्तेजित थी और आप ये याद नहीं रख सकते कि उस समय जीवन बिताना कैसा था. लेकिन अब लोगों ने बोलना शुरू किया है.

मड का ये भी तर्क है कि उस समय जो सूचनाएँ हासिल की गई, वो काफ़ी अहम थी. लेकिन क्या फिर ऐसे हमले हुए और दुनिया उत्तेजित हुई तो ऐसा फिर होगा?

मड का कहना था कि वे ये कहना चाह रहे हैं कि आज वे जिसी भी स्थिति में है, वे उस पर संतुष्ट हैं.

अमरीका ऐसा पहला देश नहीं है, जहाँ प्रताड़ना को अपनाया. ब्रिटेन ने मलय, कीनिया और उत्तरी आयरलैंड में ऐसा अपनाया. लेकिन अमरीका ऐसा पहला देश है, जहाँ इस पर खुल कर बहस हुई.

लेकिन सवाल अभी बरकरार है कि क्या प्रताड़ना कभी सही हो सकती है?

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