अकेले हैं तो क्या ग़म है

उमर अब्दुल्लाह
Image caption उमर अब्दु्ल्लाह ने हाल में अपनी पत्नी से अलग होने की बाद मानी है

भारतीय मुख्यमंत्रियों के एकल क्लब में एक नाम और जुड़ गया है. कुछ दिनों पहले जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने घोषणा की कि वह अपनी पत्नी पायल से अलग हो रहे हैं.

अब वह भारत के आठवें ऐसे मुख्यमंत्री बन गए हैं, जिनकी पत्नी या पति नहीं है. तमिलनाडु की जयललिता, उड़ीसा के नवीन पटनायक, बिहार के नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश की मायावती, गुजरात के नरेंद्र मोदी, दिल्ली की शीला दीक्षित और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी पहले से ही इस क्लब की सदस्य हैं.

नए आँकड़ों के अनुसार भारत की 49.47 फ़ीसदी आबादी पर यह एकल व्यक्ति ही राज करते हैं. एक ऐसे देश में जहाँ परिवार और पारिवारिक मूल्यों की काफ़ी कद्र की जाती है और जहाँ राजनीति में परिवारवाद का चलन सिर चढ़ कर बोल रहा है, इन ‘सिंगल’ लोगों का महत्वपूर्ण होना मायने रखता है.

एक तर्क यह है कि बिना पति या पत्नी वाले मुख्यमंत्री के पास राज्य के मामलों के लिए ज़्यादा समय उपलब्ध होता है.

कुछ लोग यह तर्क भी देते हैं कि ऐसे लोग भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार के लोभ से भी दूर रहते हैं, क्योंकि इस तरह से कमाया गया धन किसके लिए छोड़ें, यह स्पष्ट नहीं रहता.

पारिवारिक मामलों के विशेषज्ञ मनोचिकित्सक मानते हैं कि राजनीति में किसी व्यक्ति का अच्छा या बुरा करना उसके अपने व्यक्तित्व, ऊर्जा स्तर और नैतिक मूल्यों पर निर्भर करता है न कि उसके वैवाहिक दर्जे पर.

अमरीकी कॉंग्रेस के एक शोध दल ने नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार को भारत का सबसे कुशल राजनीतिक प्रशासक करार दिया है. लेकिन इसके अलावा दोनों में कोई राजनीतिक और व्यक्तिगत समानता नहीं है.

मायावती के पास कोई पारिवारिक ज़िम्मेदारी नहीं है लेकिन तब भी वह उत्तर प्रदेश को एक अच्छा प्रशासन देने में विफल रही हैं. एक और मनोचिकित्सक का मानना है कि ऐसे शादीशुदा व्यक्ति में जो ख़ुश नहीं है, एक बिना शादीशुदा ख़ुश इंसान की तुलना में कम ऊर्जा और महत्वाकाँक्षा होती है.

डेनमार्क के एक विश्वविद्यालय के समाजशास्त्रियों के एक शोध में कहा गया कि शादी शुदा होने और कार्य समर्थ होने में नज़दीकी संबंध है. शादीशुदा इंसान अकेले इंसानों की तुलना में बेहतर परिणाम दे पाते हैं.

अकेले होने का काम पर असर नहीं

नीतीश, जिनकी पत्नी का दो वर्ष पूर्व देहाँत हो गया था और उमर जो मतभेदों के कारण अपनी पत्नी से अलग होने जा रहे हैं शायद इससे इत्तेफ़ाक न रखें.

नीतीश ने एक से अधिक बार कहा है कि उनके अकेले होने से उनकी कार्य क्षमता बढ़ी है, जबकि उमर भी यही संकेत दे रहे हैं कि उनके अकेले हो जाने से उनके काम पर कोई असर नहीं पड़ा है.

नीतीश के साफ़ सुथरे होने पर विश्वास किया जा सकता है. वह विधुर हैं. उनका एक लड़का ज़रूर है लेकिन वह न तो राजनीति में है और न ही अपने पिता की बदौलत किसी महत्वपूर्ण पद पर.

लेकिन जयललिता के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. सार्वजिक जीवन में साफ़गोई के मुद्दे पर उनकी स्लेट में कई दाग हैं. उनका अपना परिवार तो नहीं है लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह उनका एक दत्तक परिवार ज़रूर है.

दोनों ही मामलें में दत्तक परिवार, असली परिवारों से ज़्यादा महत्व रखते हैं. इस ‘सिंगल ’क्लब में भी हर सदस्य की परिस्थितियाँ एक दूसरे से काफ़ी जुदा हैं.

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