इतिहास के पन्नों में- 22 सितंबर

  • 22 सितंबर 2011

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें, तो पाएंगे कि 22 सितंबर ही के दिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सर्वानुमति से भारत पाकिस्तान से लड़ाई बंद कर तत्काल युद्ध विराम करने के लिए कहा. इसी दिन साल 1980 में ईरान और इराक़ के बीच युद्ध की औपचारिक घोषणा हुई थी.

1965: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भारत पाक युद्ध विराम के लिए कहा

Image caption 1965 के युद्ध के दौरान भारतीय फ़ौजी

भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1965 में हुए युद्ध को दूसरा कश्मीर युद्ध भी कहा जाता है. कश्मीर के लिए दोनों देशों ने आपस में अपनी पहली जंग 1947 में आज़ादी के बाद लड़ी थी.

लड़ाई में कोई साफ़ विजेता नहीं था लेकिन भारत की हालत थोड़ा बेहतर थी.

इस लड़ाई में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर के नज़दीक तक भारतीय सेनाएं पहुँच गईं थी. भारतीय सेनाएं सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हाजी पीर के दर्रे के ऊपर काबिज़ हो गईं थीं. युद्ध में दोनों देशों में हज़ारों लोगों की जानें गईं और दोनों ही देश आर्थिक रूप से लंबा लड़ने में सक्षम नहीं थे.

इस लड़ाई के बीच रूस अमरीका ब्रिटेन सहित सुरक्षा परिषद के सभी सदस्यों में एक राय थी कि दोनों देश हर हालत में लड़ाई रोकें.

रूस के बीच बचाव के कारण युद्ध विराम के क़रीब चार महीने बाद भारत पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ. जनवरी में तत्कालीन सोवियत संघ के गणराज्य उज़बेकिस्तान की राजधानी में रूसी प्रधानमंत्री अलेक्सेई कोसिजिन की मौजूदगी में भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने दस्तख़त किए.

जानकारों में आज तक इस बात पर मतभेद है कि यह लड़ाई अगर ज़्यादा चलती तो भारत या पाकिस्तान में से जीत किसकी होती.

1980 : ईरान-इराक़ के बीच युद्ध की शुरुआत

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Image caption सद्दाम हुसैन को यह उम्मीद थी कि ईरान इस युद्ध में हार सकता है.

ईरान और इराक़ के बीच तीन हफ़्तों से चल रही छिटपुट झड़पों के बाद इसी दिन पश्चिम एशिया के दो देशों के बीच एक लंबी जंग की शुरुआत हुई थी. दरअसल झगड़े की जड़ दोनों देशों के बीच अल अरब की खाड़ी थी. यह खाड़ी तेल के निर्यात के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी.

इराक़ ने ईरान के कई फ़ौजी ठिकानों और ईरान के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के ऊपर बमबारी कर दी. यह लड़ाई क़रीब आठ साल चली. अधिकारिक सूत्रों के अनुसार इस युद्ध में क़रीब चार लाख लोग मारे गए और साढ़े सात लाख से ज़्यादा लोग घायल हो गए.

इस लड़ाई को शुरू करने के पहले सद्दाम हुसैन को यह उम्मीद थी की आतंरिक क्रांति के बाद ईरान अव्यवस्था से जूझ रहा है और और इस युद्ध में हार सकता है.

दूसरे सद्दाम को यह भय भी था कि ईरान का शिया नेतृत्व इराक़ में भारी तादाद में मौजूद शिया संप्रदाय के लोगों को उनके सुन्नी शासन के ख़िलाफ़ मदद करेगा.

अपने सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद दोनों देशों ने बहुत बड़ी क़ीमत चुका कर यह लड़ाई लड़ी. आख़िरकार संयुक्त राष्ट्र के बीच बचाव के बाद साल 1988 में यह युद्ध समाप्त हुआ.