पर्यावरण अनुमति पर रोक लगाने की माँग

क्या पर्यावरण संबंधी नियम क़ानून हिंदुस्तान के विकास में आड़े आ रहे हैं?

पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरमेंट का कहना है कि आँकड़ों के आइने में ये बात एकदम झूठी साबित होती है.

संस्था ने माँग की है कि खनन और दूसरी विकास परियोजनाओं के लिए वन और पर्यावरण विभाग की अनुमति देने पर तुरंत रोक लगाई जाए साथ ही इस सिलसिले में एक श्वेत पत्र निकाले जाने की माँग भी की है.

सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ने कहा है कि पिछले तीन दशकों में जंगलों का जितना इलाक़ा औद्योगीकरण की भेंट चढ़ा उसका 25 प्रतिशत सिर्फ़ बीते पाँच साल के दौरान विभिन्न उद्योगों और खनन परियोजनाओं के लिए दिया गया.

इनमें से तीन साल तक जयराम रमेश पर्यावरण मंत्री रहे जिनकी पर्यावरण-समर्थक छवि जग ज़ाहिर है.

घोटाला?

संस्था की निदेशक सुनीता नारायण ने कहा है कि पिछले पाँच वर्षों के आँकड़ों का अध्ययन करने से पता चला है कि इस दौरान खनन, विद्युत, सीमेंट, इस्पात आदि की 8,284 परियोजनाओं को पर्यावरण मंत्रालय ने हरी झंडी दिखाई.

इनमें वो परियोजनाएँ शामिल नहीं हैं जिन्हें राज्य सरकारों ने इजाज़त दी.

संस्था ने कहा है कि सिर्फ़ एक साल यानी 2009 में 87 हज़ार से ज़्यादा जंगलों की ज़मीन को उद्योंगों के लिए दे दिया गया.

सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की निदेशक सुनीता नारायण ने इसे एक बड़ा घोटाला बताया है.

उन्होंने कहा, "जब तक दूसरे मंत्रालय ये पता नहीं करते कि अनुमति हासिल करने के बाद भी कई परियोजनाएँ क्यों शुरू नहीं की गई हैं तब तक नई परियोजनाओं को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए."

रिपोर्ट कहती है कि 11 वीं पंचवर्षीय योजना में पचास हज़ार मेगावॉट अतिरिक्त ताप विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है जबकि 12 वीं योजना में इसे बढ़ाकर एक लाख मेगावॉट कर दिया गया है.

श्वेत पत्र की माँग

संस्था ने सवाल किया है कि ऊर्जा मंत्रालय को ये आकलन करना चाहिए कि आख़िर इतनी अधिक परियोजनाओं को हरी झंडी क्यों दी गई है जबकि उन परियोजनाओं पर काम नहीं हो रहा है.

सुनीता नारायण कहती हैं पर्यावरण संबंधी क़ायदे क़ानून प्रगति विरोधी नहीं है.

संस्था ने कहा है कि सरकार ने पर्यावरण संबंधी इजाज़त के आँकड़े किसी एक जगह पर इकट्ठा नहीं किए हैं.

इसीलिए अगर कोई आम नागरिक जानना चाहे कि उद्योगों को कैसे अनुमति दी गई है तो उसे ये पता नहीं चल पाएगा.

इसीलिए संस्था ने माँग की है कि सरकार इस संबंध में एक शवेत पत्र प्रकाशित करे. इस अध्ययन पर सरकार की ओर से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

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