युंगाडा में बच्चों की बलि एक व्यापार

  • 12 अक्तूबर 2011
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Image caption एलन को बेधड़ करने के लिए कुल्हाड़ी से वार किया गया था.

युगांडा की राजधानी कम्पाला से घिरे गांव और वहाँ रह रहा किसान समुदाय एक डर के साये में जी रहे हैं.

यहाँ लोगों को डर है ऐसे जा़दू-टोना करने वाले डॉक्टरों से, जो बच्चों की बलि देने के लिए उन्हें अगवा कर लेते हैं.

स्कूल जाने वाले छात्रों पर शिक्षक और अभिभावक पैनी निगरानी रखते हैं. यहाँ सड़क किनारे और मैदानों में पोस्टर लगे हुए है जो ऐसे जादू-टोना करने वाले डॉक्टरों से सावधान रहने की चेतावनी देते हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे रिवाज़ निभाने से उन्हें धन और अच्छी सेहत का लाभ होगा.

पिछले तीन सालों से ये देश ऐसे रिवाज़ों की ख़बर के दूर था, लेकिन जैसे ही वहाँ आर्थिक प्रगति हुई है, ऐसी ख़बरे दोबारा सुनने में आने लगी.

सड़क किनारे आपको बच्चों के कटे हुए शरीर मिल जाएंगें, जो मानव शरीर के बलिदान से शक्ति हासिल करने में विश्वास रखने की भावना के शिकार हो रहे हैं.

कई लोगों का मानना है कि देश का नया संभ्रांत वर्ग अपनी संपत्ति को बढ़ाने के लिए जादू-टोना करने वाले डॉक्टरों को ऐसे बलिदान करने के लिए काफ़ी पैसा देता है.

क्यों बच्चों की बलि

क्यामपिसि चाइल्डकेयर मिनिस्ट्रीज़ चर्च में पादरी पीटर सेवाकिरयंगा का कहना है, "बच्चों की बलि लेने के मामलों में इसलिए बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि लोगों को पैसे से प्यार हो गया है. वो अमीर बनना चाहते हैं."

उनका कहना है, "इन लोगों का मानना है कि अगर आप एक बच्चे की बलि चढ़ाएंगे, तो आप अमीर हो जाएंगे और ऐसे लोग है जो बच्चों का ख़रीदना चाहते हैं. ऐसे में ये बच्चे आदान-प्रदान की वस्तु बन गए हैं और बच्चों की बलि चढ़ाना एक व्यापार बन गया है."

ये पादरी और उनके इलाक़े में रहने वाले लोग सरकार से बात कर रहें कि वे इन जादू-टोना करने वाले डॉक्टरों पर नियंत्रण लगाए और पुलिस के संसाधनों में सुधार लाया जाए ताकि इस अपराध की जाँच हो सके.

आधिकारिक पुलिस आंकड़ों के अनुसार साल 2006 में बच्चे के बलिदान का एक मामला सामने आया था, वहीं 2005 में पुलिस ने कथित रिवाज़ के लिए मारे गए 25 मामलों की जाँच की है और साल 2009 में ऐसे 29 मामले सामने आए हैं.

इन घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए पुलिस टॉस्क फोर्स का गठन किया गया. इसका कहना है कि रिवाज़ के नाम पर ऐसे बलि लेने वाले मामलों में कमी आई है. इसके अनुसार साल 2006 से 38 मामले सामने आए हैं.

नाराज़गी

लेकिन पादरी पुलिस के इन आंकड़ों से इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि सरकार पूरे देश के आंकड़े गिना रही है, लेकिन उससे ज़्यादा बच्चे तो उन्हीं के इलाक़े से शिकार बनाए गए हैं

इंग्लैंड की एक संस्था जुब्ली कैंपेन ने भी पुलिस टॉस्क फ़ोर्स के काम की आलोचना की है.

अपनी रिपोर्ट में संस्था ने कहा है कि ऐसे मामले सैकड़ो में है और 900 से ज़्यादा मामले ऐसे है जिनकी पुलिस को जांच करनी है.

टेपेननसी मुझे अपने घर के नज़दीक एक खेत में लेकर गई, जहाँ उसे अपने छह साल के पोते स्टीफन की लाश मिली थी. वो चौबीस घंटों से ग़ायब था.

जब उन्होंने मुझे वो जगह दिखाई तो वे काँप रही थी. उन्होंने मुझे दिखाया कि किस जगह उन्हें अपने पोते की बेधड़ लाश मिली थी.

अनसुनी

उसके पास अपने पोते की एक ही फोटो थी, जिसे हाथ में थामें वो रो रही थी. उन्होंने बताया कि एक स्थानीय जादू-टोना करने वाले डॉक्टर ने उनके पोते स्टीफ़न की बलि लेने की बात स्वीकार कर ली थी लेकिन पुलिस इस मामले की जाँच नहीं कर रही है.

उनका कहना था, "उन्होंने मुझे चुप रहने के लिए कुछ पैसे दिए लेकिन मैंने इससे इंकार कर दिया."

युगांडा की सरकार में से किसी ने भी मुझे साक्षात्कार देने से इंकार कर दिया और पुलिस भ्रष्टाचार और कार्रवाई न करने की बात अस्वीकार करती है.

पुलिस टॉस्क फोर्स के कमिश्नर बिगनोए मोसिस का कहना है कि पुलिस को इस मामले से निपटने के लिए जो कुछ करना चाहिए, वो किया जा रहा है.

कम्पाला के एक मुख्य अस्पताल में न्यूरो सर्जन माइकल मुहूमोजा ने मुझे नौ साल के एलन का एक्सरे दिखाया. उसे कई जगहो पर ख़तरनाक चोटें आई थी.

उसके खोपड़ी की एक हड्डी ग़ायब है और उसकी मस्तिष्क का एक हिस्सा बर्बाद हो चुका है. इस बच्चे को बेधड़ करने के लिए कुल्हाड़ी से वार किया गया था. एक महीने पहले ही एलन कोमा से जगा है.

एलन अपने हमलावरों को पहचानने में कामयाब हो गया था लेकिन पुलिस उसे अविश्वसनीय करार दे रही हैं.

पादरी सेवाकिरयंगा का कहना है कि जब तक क़ानून पूरी तरह से लागू नहीं होगा, तब तक इस पर लगाम नहीं लगाई जा सकेगी.

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