इतिहास के पन्नों से...

अगर इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पाएंगें कि 14 अक्तूबर के दिन 1994 में जहां दो इसराइली मंत्रियों और फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई थी, वहीं थाइलैंड में सैन्य सरकार के ख़िलाफ़ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे.

1994: दो इसराइली मंत्रियों और यासिर अराफ़ात को नोबेल शांति पुरस्कार

Image caption 13 सितंबर 1993 को व्हाइट हाउस में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात और इसराइली प्रधानमंत्री के बीच एक ऐतिहासिक संधि हुई थी.

13 अक्तूबर 1994 के दिन फ़लस्तीनी आंदोलन के प्रतीक माने जाने वाले नेता यासिर अराफ़ात और दो इसराइली मंत्रियों को नोबेल शांति पुरस्कार का विजेता घोषित किया गया था.

इसराइली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक रॉबिन, विदेश मंत्री शिमोन पेरेज़ और फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई.

ये इतिहास में पहली बार था कि नोबेल शांति पुरस्कार दो से ज़्यादा लोगों को दिया गया.

नोबेल समिति ने वक्तव्य जारी कर कहा कि ये पुरस्कार इन फ़लस्तीनी और इसराइली प्रतिनिधियों को इसलिए दिया जा रहा है कि क्योंकि शांति बहाल करने के लिए इनके प्रयास सराहनीय रहे हैं.

13 सितंबर 1993 को व्हाइट हाउस में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात और इसराइली प्रधानमंत्री के बीच एक ऐतिहासिक संधि हुई थी, जिसमें गज़ा पट्टी और पश्चिमी तट के जेरिको शहर में रहने वाले फ़लस्तीनियों को सीमित स्वायत्तता देने पर सहमति जताई गई थी.

इस पुरस्कार की घोषणा के दौरान नोबेल समिति के सदस्यों के बीच गहरे मतभेद पैदा हो गए थे, जिसके बाद एक सदस्य ने समिति से इस्तीफ़ा दे दिया था.

केयर क्रिस्टियानसेन ने यासिर अराफ़ात के चुने जाने पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि यासिर का व्यक्तित्व हिंसा, चरमपंथ और उत्पीड़न जैसे कुकर्मों से जुड़ा हुआ था.

1973: थाइलैंड की सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई

आज ही के दिन थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में सरकारी सेना और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प में कई लोगों की मौत हो गई थी.

मारे गए लोगों में से ज़्यादातर विद्यार्थी थे, जो थाइलैंड की सैन्य प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे.

ये हिंसा तब भड़की जब हज़ारों विद्यार्थी सैन्य सरकार के शासन के पतन की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आए और एक नए संविधान की मांग की.

प्रदर्शनकारियों ने सरकारी सेना पर पथराव किया और उन पर पेट्रोल बम फेंके. इसके जवाब में पुलिस ने उन पर गोलीबारी की.

छात्रों का ग़ुस्सा फ़ील्ड मार्शल थानोम के शासन पर था. 1947 से थाइलैंड में सैन्य सरकार का शासन चला आ रहा था.

प्रदर्शनों के बीच सरकार ने 12 दिनों के भीतर नया संविधान लाने की बात कही, लेकिन सरकार के वादों को लेकर लोगों के बीच संदेह की भावना रही.

विरोध प्रदर्शन जारी रहे जिसके बाद आपातकाल की घोषणा कर दी गई.

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