आर्सेनिक मुक्त पानी से भी मौत

  • 17 अक्तूबर 2011
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Image caption पानी में आर्सनिक की कमी

बांग्लादेश में क़रीब तीन दशक पहले सरकार की पहल पर ये कोशिश शुरु हुई थी कि वहाँ के लोग आर्सेनिक मुक्त पानी का इस्तेमाल करें और इसके लिए पूरे देश में बड़े पैमाने पर कम गहराई वाले ट्यूबवेल लगाए गए.

लेकिन एक ताज़ा शोध में ये तथ्य सामने आया है कि आर्सेनिक मुक्त पानी का सेवन करने से भी बांग्लादेश में हर साल हज़ारों बच्चों की मौत हो रही है.

आर्सेनिक यानि संखिया का इस्तेमाल आमतौर पर कीटनाशकों और चूहे मारने की दवाई बनाने में किया जाता है. इस शोध के मुताबिक जब लोगों ने आर्सेनिक मुक्त पानी का इस्तेमाल करना शुरु किया तब उन्होंने अपने-अपने घरों में पानी का भंडारण करने के अलावा, घर से बाहर निकलने पर अपने साथ पानी ले जाना भी शुरु किया.

लंबे समय तक घर में पानी जमा करने और उसे एक जगह से दूसरे जगह तक ले जाने के कारण उस पानी के इस्तेमाल से खासकर बच्चों में जीवाणु संक्रमण(बैक्टीरियल इंफेक्शन) का ख़तरा बढ़ गया जिसका सीधा असर देश में छोटे बच्चों की हो रही मौतों पर हुआ है, जिनकी मृत्युदर में पच्चीस फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.

बीबीसी संवाददाता मैट मैक्ग्रा के अनुसार बांग्लादेश की गिनती उन देशों में की जाती है जहां बड़ी संख्या में ज़हरीले पानी से मौतें हुई हैं.

संयुक्त राष्ट्र की पहल

1970 में वहां लोगों को साफ़ पानी देने की कोशिश में बड़ी संख्या में कम गहराई वाले ट्यूबवेल लगाए गए थे तब मिट्टी में आर्सेनिक ने लाखों लोगों के शरीर में पहुंच कर उन्हें बीमार कर दिया था.

लेकिन पिछले तीस साल से संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने यहां के लोगों को कम गहराई वाले कुओं से पानी पीने को प्रेरित किया, जिनमें ट्यूबवेल की तुलना में कम मात्रा में आर्सेनिक मौजूद थे.

लेकिन इस ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र की पहल पर शुरु की गई ये कोशिश भी यहाँ के लाखों-करोड़ों बच्चों के जीवन के लिए लिए बुरी ही साबित हुई है और वो एक बार फिर से मौत के मुहाने पर खड़े हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार ये छोटे और कम गहराई वाले कुँए अक्सर लोगों के घरों से दूर होते हैं जिस कारण एक तरफ जहाँ पानी के भंडारण और उसे एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने की प्रक्रिया बढ़ जाती है तो दूसरी ओर उससे जीवाणुओं का संक्रमण भी कई गुना ज़्यादा हो जाता है, नतीजा ये हुआ कि देश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर में पच्चीस फ़ीसदी तक का इज़ाफा हो गया है.

इस शोधकार्य में शामिल हार्वर्ड विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक डॉक्टर ऐरिका फील्ड के मुताबिक बच्चों को आर्सेनिक मुक्त पानी देना किसी भी तरह से अच्छा विकल्प नहीं है.

हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि इस शोध के नतीजे भले ही दिलचस्प हों लेकिन बेहद साधारण हैं इसलिए इस पर आगे भी काम करने की ज़रूरत है ताकि ये प्रमाणित हो सके कि पीने के पानी में हो रहे संक्रमण की असल वजह आर्सेनिक का कम होना है या कुछ और.

संयुक्त राष्ट्र ने ज़ोर देते हुए कहा है कि देश भर में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में ख़ासी गिरावट आई है.

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