हज़ार के बदले एक का गणित

  • 18 अक्तूबर 2011
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Image caption एक गिलाद की रिहाई के लिए इसराइल को 1027 फ़लस्तीनी बंदियों को छोड़ने के लिए तैयार होना पड़ा.

इसराइली-फ़लस्तीनी बंदी अदला बदली योजना के मानवीय पहलू के साथ-साथ एक और दूसरा पहलू भी है. वो ये है कि क्या एक इसराइली सैनिक की जान 1027 फ़लस्तीनी बंदियों की जान के बराबर है.

आख़िर ऐसा क्यों है?

इसराइल का इन शर्तों पर समझौते के लिए राज़ी होना उसकी ताक़त और कमज़ोरी दोनों को दर्शाता है.

ये इसराइल की ताक़त इस तरह है कि इस समझौते के ज़रिए इसराइली सेना और उनके परिवार वालों को ये संदेश दिया गया है कि किसी भी इसराइली सैनिक के पकड़े जाने की स्थिति में उनकी रिहाई के लिए हर संभव क़दम उठाया जाएगा.

इसमें इसराइल की कमज़ोरी ये है कि ये भविष्य में किसी संभावित अपहरणकर्ता को इस बात की दावत देता है कि इसराइल के किसी सैनिक या नागरिक को पकड़ कर इसराइल को उसकी भारी क़ीमत चुकाने पर मजबूर किया जा सकता है.

इसके पीछे कई कारण हैं.

इसराइली सेना

सबसे पहला कारण शायद इसराइली सेना आईडीएफ़ का स्वरूप है.

इसराइल के आलोचक उसकी सेना के बारे में चाहे जो कहें लेकिन सच्चाई ये है कि बहुत सारे इसराइली नागरिकों की नज़र में उनकी सेना उनके देश की असल पहचान और उसकी निगहबान है.

यहूदी समाज इसराइल की कुल जनसंख्या का लगभग 75 फ़ीसदी हैं. यहूदी समाज के लिए सेना वर्दी में एक राष्ट्र की तरह है.

इसके कारण अभी भी इसराइली नागरिकों का उनकी सेना से एक भावनात्मक लगाव है जो कि शायद अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में भुला दिया गया है क्योंकि अब उन देशों में एक वेतनभोगी पेशेवर सेना है.

इसराइल के राष्ट्रपति शिमोन पेरेज़ का कहना है, ''इसराइली सेना के बेग़ैर इसराइल का कोई अस्तित्व नहीं है.''

इसलिए इसराइल के एक सैनिक के पकड़े जाने से उस तरह का राजनीतिक दबाव पड़ता है जो कि किसी दूसरे देश में शायद ही संभव है.

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Image caption फ़लस्तीनी बंदियों की रिहाई की खुशियां मनाते उनके परिजन

गिलाद शलित के परिवार वालों ने ख़ुद को इसराइल में एक प्रभावी दबाव समूह बना लिया है जिसकी उपस्थिति इसराइल के राष्ट्रीय जीवन में साफ़ दिखती है.

गिलाद की स्थिति की आप दो साल पहले अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथियों के ज़रिए पकड़े गए अमरीकी सैनिक बो बर्गदाही से तुलना करें.

अमरीकी सेना उनकी रिहाई के लिए ज़रूर कोशिश कर रही होगी लेकिन उनका पकड़ा जाना अमरीकी राजनीतिक जीवन में रोज़ाना चर्चा में रहने वाला मामला बिल्कुल नहीं है.

इसके अलावा इसराइल के यहूदी राष्ट्र होने का भी इस फ़ैसले पर असर पड़ा है. यहूदियों की पवित्र धार्मिक किताब 'टालमुड' के अनुसार किसी एक व्यक्ति की जान बचाना पूरी मानवता की जान बचाने के बराबर है.

इसराइली प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतन्याहू ने गिलाद शलित के समझौते के लिए राष्ट्र के सामने यही दलील रखी थी.

व्यावहारिक कारण

लेकिन इस फ़ैसले के पीछे इन सब कारणों के अलावा कुछ ख़ालिस व्यावहारिक कारण भी थे.

मसलन इतिहास गवाह है कि अगर इसराइल के पास गिलाद शलित को सैन्य कार्रवाई के ज़रिए छुड़ाने का विकल्प होता तो वो ज़रूर करता लेकिन इस मामले में उसके पास ये विकल्प नहीं था.

दूसरे ये कि इसराइल के दुश्मन जानते हैं कि इस तरह के मामले में इसराइल बड़ी से बड़ी क़ीमत चुकाने के लिए तैयार रहता है.

अस्सी के दशक में कई वर्षों तक ये बात आम थी कि लिबनान में मारे गए इसराइली वायु सेना के एक अधिकारी रॉन आरद के बारे में कोई भी जानकारी देने के लिए इसराइल बहुत बड़ी रक़म चुकाने को तैयार था.

ऐसा माना जाता है कि रॉन आरद कुछ समय के लिए ईरानी सरकार के हाथ लग गया था.

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हालाकि अब ऐसा माना जाता है कि रॉन आरद की मौत उसी दौरान हो गई थी लेकिन अगर उनको छुड़ाने की कोई भी गुंजाइश होती तो इसराइल उसके लिए बड़ी से बड़ी रक़म देने के लिए तैयार था.

उसी तरह 1985 में एक बार तीन इसराइली सैनिकों की रिहाई के लिए इसराइल ने 1150 बंदियों को छोड़ दिया था.

इसराइली प्रधानमंत्री की शायद यही सोच है कि पश्चिमी तट और ग़ज़ा में थोड़ी शांति होने के कारण बंदियों की अदला-बदली से इसराइली जनता में ज़्यादा प्रतिक्रिया नहीं होगी.

इस समझौते में मिस्र की भी अहम भूमिका है. मिस्र की इच्छा है मध्य-पूर्व में एक बड़ी शक्ति बनने की और हमास के ऊपर उसका कुछ प्रभाव भी है क्योंकि सीरिया में मौजूदा हालात के कारण हमास को मिस्र में एक नए ठिकाने की तलाश है.

इसराइल के लिए भी मिस्र की मध्यस्थता में किए गए समझौते को स्वीकार करना अक़्लमंदी की बातें हैं ख़ासकर ऐसे समय में जब इसराइल और मिस्र के अपने आपसी समझौते ख़टाई में पड़ते दिख रहें हैं.

लेकिन इन सब आकलनों के बावजूद इस अत्यंत महत्वपूर्ण दिन में इस समझौते के भावनात्मक पहलू को कम नहीं किया जा सकता है.

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