'हरी झंडियों की गाड़ी'

  • 19 अक्तूबर 2011
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Image caption कितना उचित है ये कहना कि विकास की राह में पर्यावरण कानून बाधक हैं

पर्यावरण आर्थिक विकास को धीमा कर कर रहा है. ये काफ़ी आम सा जुमला है उन गलियारों में जो मायने रखते हैं.

जब मंत्रियो के एक समूह से (जिन्हें जंगलों में कोयले की खदानों के मामलों के विवाद को सुलझाने के लिए कहा गया था) ये रिपोर्ट मांगी गई थी कि इस विवाद पर क्या किया जाए, तो उन्होंने कहा कि सबसे अच्छा तो ये होगा कि पर्यावरण से जुड़ी सभी शर्तों को ख़ारिज कर दिया जाए.

बीके चतुर्वेदी समीति ने ये सुझाव दिया है कि सभी कोयले की खनन परियोजनाओं को स्वत: हरी झंडी मिल जानी चाहिए सिवाय उन परियोजनाओं के जो कि घने जंगलों के हैं.

घने जंगलों की परिभाषा कुछ भी नहीं दी गई है. ना ही पानी और आजीविका के लिए जंगलों की महत्ता पर ही कोई समझदारी बनाई गई है.

समिति ये भी चाहती है कि वो सभी प्रावधान जो लोगों के अधिकार के बचाव की बात करते हों या पर्यावरण के बचाव की चर्चा करते हों, उन सभी प्रावधानों में ढील बरतनी चाहिए.

साथ ही वर्तमान में जितनी खदानें हैं उनके विस्तार पर कोई जन सुनवाई न की जाए.

उल्टा सच

इन बड़ी परियोजनाओं के भंयकर परिणामों को नज़दरअंदाज़ करना चाहिए क्योंकि समिति की रिपोर्ट के मुताबिक हम एक ऐसा देश हैं जो जल्दबाज़ी में है. हमारे पास समय नहीं है.

ये रिपोर्ट देश में मौजूद एक आम मूड को दर्शाती है....और इसी वजह से प्रस्तावित उत्पादन नीति कई सारे पर्यावरण नियमों और शर्तों को हटाने के पक्ष में है.

रिपोर्ट चाहती है कि केंद्र और राज्य सरकार से पर्यावरण और जंगलों के क्लियरेंस का अधिकार हटा लिया जाए और जो परियोजना लागू करना चाहते हों, उनके हाथों में ये ताक़त दे दी जाए.

पर क्या सचमुच पर्यावरण से जुड़ी शर्तो ने परियोजनाओं के लागू होनें में रोड़े अटकाए हैं?

मेरे साथियों ने जवाब की तलाश में सार्वजिनक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध पर्यावरण और वन मंत्रालय के आंकड़ो का गहन अध्यन किया है.

जो उन्हें ढ़ूंढने पर मिला उससे तो हमें सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि आख़िर विकास में पर्यावरण के गतिरोध पर इतना बड़ा बखेड़ा क्यों खड़ा किया जा रहा है.

दरअसल सच इसके उल्ट ही है. पर्यावरण की हरी झंडी देने के तौर तरीके पर्यावरण को बचाने में विफल रहे हैं.

हमें इस बात से चिंता होनी चाहिए. हमें इस बात पर गुस्सा आना चाहिए.

‘ग्रीन क्लियरेंस’ की रफ़्तार दोगुनी

पहले ये साफ़ होना चाहिए कि पिछले पांच सालों में ‘ग्रीन क्लियरेंस’ की रफ़्तार अभूतपूर्व रही है.

दरअसल रफ़्तार दोगुनी हो गई है, यानी 203,576 हेक्टर की वन भूमि को खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

इस ज़मीन का आधे से ज़्यादा कोयले के खनन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और कम से कम 113 कोयले खनन की परियोजनाओं को हरी झंडी मिली है.

ये 1981 के बाद पहला मौका है जब किसी पंच-वर्षीय योजना में एक साथ इतनी परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई है.

दूसरा, जब इन मंज़ूर की गई परियोजनाओं को एक साथ जोड़ें तो पता चलेगा कि ये वर्तमान और भविष्य के लक्ष्यों से उपर है.

अगर बिजली परियोजना की बात करें तो 11वी पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य था कि 2012 तक पचास हज़ार मेगावाट अतिरिक्त बिजली पैदा की जाएगी. 12वी योजना में सुझाव था 100,000 मेगावाट अतिरिक्त इसमें जोड़ा जाए.

इस लक्ष्य को 2017 तक प्राप्त करना था. लेकिन पिछले पांच सालों में, 2011 अगस्त तक पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 210, 000 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए अनुमति दे दी है जो 2017 तक के लक्ष्य से साठ हज़ार मेगावाट ज़्यादा है.

लेकिन पिछले पांच सालों में केवल 32,394 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता बनाई गई है तो फिर नई परियोजनाओं को मंज़ूरी देने का दबाव क्यों जब कि पुरानी मंज़ूर परियोजनाओं पर काम ही नहीं हुआ है ?

नुकसान पर्यावरण का

इन सब बातों से एक बात साफ हो रही है कि हरी झंडी देने की होड़ में नुकसान केवल पर्यावरण का हो रहा है. देश के ज़्यादातर ज़िले जहां खनन का काम चल रहा है वहां ज़िंदगी नरक से बदतर हो चुकी है.

कोई वहां हो रहे परिरयोजनाओ के विकास के नाम पर पर्यावरण को हो रहे नुकसान की भरपाई नहीं करना चाहता है.

क्या होना चाहिए. मेरे विचार से पर्यावरण नीतियों को और मज़बूत करने की ज़रूरत है ना कि उन्हें और ढ़ीला किया जाए.

विकास की दुहाई देने वाले पर्यावरण की आड़ छोड़ इस बात की पड़ताल करें कि किस वजह से वे उद्दोगों की संख्या बढ़ा नहीं पा रहे हैं.

सबसे ज़रूरी ये है कि पर्यावरणविद ये देखें कि कैसे नियंत्रण की ढांचे को बेहतर किया जा सके. यही एक मात्र चीज़ है जो कोई मायने रखती है.

(ये लेख इस संस्था की पत्रिका डाउन टू अर्थ में छपे संपादकिय से साभार लिया गया है. इसमें छपी राय सुनीता नारायण की निजी राय है.)

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