गद्दाफ़ी की राजनीतिक यात्रा

  • 20 अक्तूबर 2011
गद्दाफ़ी
Image caption गद्दाफ़ी ने चालीस से भी अधिक साल तक लीबिया पर राज किया

मुआमार गद्दाफ़ी सितंबर 1969 में सत्ता में आए थे. उन्होंने सम्राट इदरिस को एक सैनिक कार्रवाई में सत्ता से हटाया था.

उस वक़्त गद्दाफ़ी 27 साल के थे. मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर से प्रेरित गद्दाफ़ी उस समय अरब राष्ट्रवाद की फ़िज़ा में बिल्कुल फिट बैठे थे.

लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र में अपने वक़्त के सभी प्रशासकों को पीछे छोड़ दिया.

क़रीब 41 साल सत्ता में रहते हुए उन्होंने सरकार चलाने की अपनी ही एक व्यवस्था खोजी जिसमें उत्तरी आयरलैंड के आईआरए जैसे हथियारबंद चरमपंथी गुटों के साथ-साथ फ़िलीपीन्स में इस्लामी कट्टरपंथी गुट अबु सय्याफ़ जैसी संस्थाओं को समर्थन दिया.

उन्होंने उत्तरी अफ़्रीका के सबसे क्रूर तानाशाह के रूप में लीबिया पर राज किया.

अपनी सत्ता के आख़िरी दिनों में स्कॉटलैंड में दिसंबर 1988 में पैन एम को उड़ाने के बाद अलग-थलग पड़े लीबिया को गद्दाफ़ी एक बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वीकार्य बना पाने सफल रहे थे.

लीबिया को एक बार फिर पश्चिमी देशों और कंपनियों ने देश के बड़े ईंधन भंडार की वजह से गले लगाना शुरू कर दिया था.

उनको सत्ता से हटाने वाला विद्रोह फ़रबरी 2011 में लीबिया के दूसरे बड़े शहर बेनग़ाजी से शुरू हुआ था. एक ऐसा शहर जिसे गद्दाफ़ी ने नज़रअंदाज़ किया था और जहां उनके पूरे कार्यकाल के दौरान गद्दाफ़ी पर किसी ने भरोसा नहीं किया था.

जमाहिरिया

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Image caption गद्दाफ़ी जहां भी जाते अपना तंबू तान लेते थे.

कर्नल गद्दाफ़ी का जन्म एक बद्दू परिवार में सिर्त में 1946 में हुआ था.

उन्होंने हमेशा अपनी कबायली पहचान को सहेज कर रखा और वो अपने मेहमानों का स्वागत अपने टेंट में करते थे और अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भी कई बार टेंट में ही रहते थे. गद्दाफ़ी शासन को शुरूआत में उनकी गैर-औपनिवेशिक साख और बाद में देश को ‘एक लगातार चलने वाली क्रांति’ में रखने से मिलती रही.

उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा को अपनी पुस्तक ग्रीन बुक में ‘लोगों की सरकार’ के रूप में पेश किया. साल 1977 में गद्दाफ़ी ने लीबिया को एक जमाहिरिया घोषित किया. इस शब्द का अर्थ है – ‘लोगों का राज’

सिद्धांत ये था कि लीबिया लोगों का लोकतंत्र बन गया है जिसे लोकप्रिय स्थानीय क्रांतिकारी परिषदें चला रही हैं. लेकिन वास्तव में हर प्रमुख फ़ैसला और लीबिया का धन उनके मज़बूत कब्ज़े में ही रहा.

सामाजिक सिद्धांत

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Image caption गद्दाफ़ी ने लीबिया में कई राजनीतिक प्रयोग किए जिन्हें उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति का नाम दिया

गद्दाफ़ी एक दक्ष राजनीतिक व्यक्ति थे जो लीबिया की अलग-अलग जनजातीय को एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल करते थे. इसी तरह से उन्होंने ख़ुद को एक महानायक बना लिया था.

गद्दाफ़ी लगातार लीबिया पर एक ‘पुलिस राज्य’ की तर्ज पर मज़बूत नियंत्रण बढ़ाते गए. लीबिया वासियों के लिए 1980 का दशक काफ़ी मुसीबतों भरा रहा. इस दौरान गद्दाफ़ी ने अपने सामाजिक सिद्धांतों के कई प्रयोग किए.

अपनी सांस्कृतिक क्रांति के तहत उन्होंने सभी निजी व्यवसाय बंद कर दिए और साथ ही कई किताबों को जला डाला.

उन्होंने विदेशों में रह रहे अपने विरोधियों की हत्याएं भी करवाईं. गद्दाफ़ी ने लीबिया में बोलने की स्वतंत्रता पर पुरी तरह से रोक लगाई. उन्होंने कई बार अपने विरोधियों का हिंसक दमन किया.

इसके बाद लॉकर्बी में एक हवाई जहाज़ को उड़ाने के बाद गद्दाफ़ी और लीबिया अंतरराष्ट्रीय पटल पर अलग-थलग पड़ गया. गद्दाफ़ी के आलोचकों के लिए उनका सबसे बड़ा गुनाह अपनी विदेश यात्राओं पर राष्ट्रीय धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार रहा है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वापसी

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Image caption लॉकर्बी में हवाई जहाज़ उड़ाने की ज़िम्मेदारी लेकर गद्दाफ़ी ने पश्चिम के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की थी.

साल 2010 में साठ लाख लोगों वाले इस देश को तेल से 32 बिलियन अमरीकी डॉलर की कमाई हो रही थी. लेकिन अधिकतर लीबियाई लोगों को इस अपार धन से कोई फ़ायदा नहीं हुआ था क्योंकि उनका रहन-सहन किसी ग़रीब मुल्क़ के निवासियों जैसा ही था.

सरकार के बाहर नौकरियों की कमी के कारण लीबिया में बेरोज़गारी की दर क़रीब 30 प्रतिशत है. लीबिया के ‘समाजवाद’ में मुफ़्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रियायत पर आवास एंव यातायात शामिल है लेकिन देश में वेतन बहुत ही कम है.

विदेशी निवेशों से मिलने वाला अधिकतर धन देश के चुनींदा लोगों की जेब में ही जाता रहा है. साल 1999 में गद्दाफ़ी ने लॉकर्बी विमान की उड़ाने की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर अंतरराष्ट्रीय पटल पर वापसी की.

अमरीका पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमले के बाद गद्दाफ़ी ने अमरीका के ‘आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध’ का समर्थन किया. इराक़ पर साल 2003 में अमरीकी हमले के बाद लीबिया ने अपने जैविक और परमाणु हथियारों को बनाने की योजना को छोड़ने के ऐलान किया.

अपने शासन के अंतिम दिनों में उनके उत्तराधिकारी को लेकर प्रश्न उठने शुरू हो गए थे. उनके दो पुत्रों में इसके लिए खुलेआम प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई थी.

आख़िरी दिनों में उनके बड़े पुत्र सैफ़ अल-इस्लाम जो मीडिया में दिलचस्पी रखते थे, अपने छोटे भाई मुत्तसिम से पिछड़ते नज़र आ रहे थे. मुत्तसिम लीबिया के सुरक्षाबलों में एक ताक़तवर भूमिका रखते थे.

अरब जगत में पिछले डेढ़ साल से आए राजनीतिक बदलावों और आंदोलनों का असर लीबिया पर भी पड़ा और लोग साल 2011 की शुरूआत में 40 साल पुराने शासन के ख़िलाफ़ खड़े हो गए.

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