लीबिया की लड़ाई में अमरीका की भूमिका

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Image caption लीबिया की लड़ाई में अमरीका की भूमिका

लीबिया में कर्नल गद्दाफ़ी की हार और राष्ट्रीय अस्थाई परिषद की सेना को मिली सफलता के पीछे जहां एक ओर नेटो के हवाई हमले हैं वहीं दूसरी ओर इस तरह के मामलों में अमरीका की नई युद्धनीति को भी सामने रखा.

नेटो के हवाई हमलों ने ये सुनिश्चित किया कि गद्दाफ़ी के पास जो बेहतरीन हथियारों का जख़ीरा मौजूद था उसे कैसे बेअसर किया जाए.

अमरीका ने इस पूरे मसले पर एक तरह से अपने आपको पीछे ही रखा था जिससे वो पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय विवादों से निपटने के लिए एक नए आदर्श के रूप में उभर सके.

अमरीका की नई युद्धनीति

लीबिया की लड़ाई अंतरराष्ट्रीय जगत में अमरीका की नई युद्ध नीति की शुरुआत है. जो लोग एक युद्ध को देखकर उसे एक मिसाल के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं उनके लिए लीबिया की लड़ाई एक सीख है.

इससे पहले जब अफ़गानिस्तान और इराक़ में नेटो, अमरीकी विमानों पर सवार होकर हमला कर रहा था तब ज़्यादातर लोगों ने ये सोच लिया था अमरीका भविष्य में ऐसे ही आसमान से युद्ध लड़ेगा जबकि स्थानीय सेना ज़मीन से वार करेगी.

इन दोनों ही युद्ध में अमरीका के अलावा मित्र देशों की सेना भी शामिल थीं जिसमें बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे.

लीबिया की जंग में अमरीका

लीबिया में ख़त्म हुई लड़ाई का स्वरूप भी कुछ हद तक ऐसा ही रहा है. यहां भी अमरीका और नैटो ने ज़्यादातर हवाई हमले किए हैं.

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Image caption त्रिपोली में नैटो के हवाई हमले

अमरीका ने इस बार ब्रिटेन और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों को आगे से मोर्चा संभालने दिया जबकि खुद ओबामा प्रशासन ने पीछे ही रहे.

लेकिन इसके बाद भी पूरी लड़ाई में अमरीका की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. लीबिया के हवाई हमलों से सुरक्षा करने वाले तंत्र को तबाह करने में अमरीका की सीधी भूमिका रही है.

नेटो के साथ अमरीका

इसके अलावा अमरीका ने ड्रोन हमलों, टैंकरों और गुप्त सूचना इकट्ठा करने वाले तंत्र के ज़रिए नेटो को महत्वपूर्ण सहयोग दिया. लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ओबामा प्रशासन के लिए लीबिया का मुद्दा उतना बड़ा नहीं था जितना कि यूरोपीय देशों के लिए था.

इसके अलावा बराक ओबामा इस पूरे प्रकरण के दौरान पहले के युद्ध यानि इराक़ और अफ़गानिस्तान से संबंधित उलझनों को सुलझाने में लगे हुए थे.

वैसे हाल के युद्धों से मिले अनुभवों और आर्थिक संकट से ये समझ में आता है कि विदेशी धरती पर भारी संख्या में सेना की तैनाती करने की नीति अब कारगर नहीं है.

लेकिन ये भी ज़रूरी नहीं कि भविष्य में होने वाले सभी युद्धों का लीबिया जैसा ही नतीजा निकले.

अरब की खाड़ी या प्रशांत महासागर के हिस्से में उठे किसी संकट पर अमरीका हवाई के साथ-साथ समुद्र के रास्ते से भी हमला कर सकता है, जो लीबिया से बिल्कुल अलग होगा.

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