कश्मीर में भारतीय सैनिक

  • 27 अक्तूबर 2011
कश्मीरी प्रदर्शनकारी

आज ही के दिन 1947 में जम्मू कश्मीर के महाराजा हरीसिंह के निवेदन पर भारतीय सैनिक राज्य में पहुँचे. ब्रिटिश शासकों के जाने के साथ ही विभाजन हो गया लेकिन कश्मीर को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी. महाराजा हरीसिंह ने भारत में विलय का विरोध किया था. लेकिन इसी बीच पाकिस्तान की ओर से क़बाइलियों ने जम्मू कश्मीर पर हमला कर दिया.

मजबूरन महाराजा हरीसिंह ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मदद की अपील की. नेहरू ने कहा कि कश्मीर के भारत में मिलने तक भारतीय सैनिकों का वहाँ क़दम रखना ग़ैरक़ानूनी होगा.

इसलिए एक दिन पहले यानी 26 अक्तूबर को महाराजा ने विलय के दस्तावेज़ पर दस्तख़त किए. 27 अक्तूबर को भारतीय सैनिक श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरने शुरू हो गए.

कश्मीर में हथियारबंद अलगाववादी आंदोलन तेज़ होने पर हर साल 27 अक्तूबर को कश्मीर घाटी में विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं.

युद्ध विरोधी प्रदर्शन

1968 में आज ही के दिन लंदन के ग्रोज़वेनर स्क्वेयर पर युद्ध विरोधी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ. लगभग 6000 प्रदर्शनकारी वहाँ अमरीकी दूतावास के सामने इकट्ठा हो गए.

ये एक दूसरे बड़े युद्ध विरोधी प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे थे जो वियतनाम में अमरीका के दख़ल के ख़िलाफ़ था.

ये प्रदर्शन माओवादी ब्रिटेन-वियतनाम सॉलिडैरिटी फ़्रंट के झंडेतले किया जा रहा था. प्रदर्शनकारियों में से कुछ लोगों ने पुलिस क़तारें तोड़ने की कोशिश की लेकिन तीन घंटे की गुत्थमगुत्था के बावजूद उसे तोड़ने में नाकाम रहे.

लेकिन प्रदर्शनकारियों का दूसरा हिस्सा शांतिपूर्ण तरीक़े से आगे बढ़ता हुआ हाइड पार्क तक पहुँच गया.

गुमशुदा वैज्ञानिक

1950 में ब्रिटेन के परमाणु वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर ब्रूनो पोंटेकोरवो की गुमशुदगी से पूरा ख़ुफ़िया तंत्र खड़खड़ा उठा. आज ही के दिन यानी 27 अक्तूबर को ख़ुफ़िया एजेंसी एमआइ5 को उनकी खोज के काम में लगाया गया.

प्रोफ़ेसर पोंटेकोरवो और उनकी परिवार सितंबर में फ़िनलैंड आ गया था लेकिन उसके बाद से उनका कोई अता पता नहीं था.

उनकी गुमशुदगी से दस महीने पहले ही एक और वैज्ञानिक क्लॉस फ़च ने स्वीकार किया था कि वो सोवियत संघ के लिए जासूसी करते थे.

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