यूरोप 'ग़रीबों देशों के मसीहा' आईएमएफ़ का रुख करे: मोंटेक

  • 29 अक्तूबर 2011
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Image caption फ़्रांस में जी 20 के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक के पहले इन देशों के मंत्रियों की एक बैठक को संबोधित करते फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी

चाहें तो इसे बदलते वक़्त की बानगी कहिए, भारत ने आर्थिक संकट से महाभारत लड़ रहे यूरोपीय संघ को उसी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेने की हिदायत दी है जिसके पास विकसित देश तमाम विकासशील और गरीब देशों को जाने कहते हैं.

योजना आयोग के उपध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने कहा है कि अंतरराष्ट्रिय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) केवल ग़रीब मुल्कों के लिए नहीं है बल्कि यूरोप के वो देश जो आर्थिक संकट से गुज़र रहे हैं वो भी इस संस्था का लाभ उठा सकते हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जी-20 देशों की बैठक में भाग लेने जाने से पहले अहलुवालिया शनिवार को पत्रकारों को दिल्ली में संबोधित कर रहे थे.

'आईएमएफ़ है सही रास्ता'

अहलुवालिया से पूछा गया कि क्या आग्रह करने पर भारत संकट में फंसे यूरोपीय संघ की मदद करने के लिए आगे आयेगा?

अहलुवालिया ने कहा, "यूरोप की समस्या का हल यूरोप को खुद निकलना होगा और वो ऐसा कर भी रहा है पर अगर वो विफल रहता है तो उसे आईएमएफ़ के पास जाना चाहिए. मान लीजिए अगर आईएमएफ़ को लगता है कि उसके पास संसाधन कम हैं तो आईएमएफ़ सदस्य देशों से और पैसा देने के लिए कह सकता है."

अहलुवालिया का कहना था कि अगर आईएमएफ़ यूरोप की मदद करता है तो उन पर भी वही सब शर्तें लागू होंगीं जो विकासशील देशों पर हुआ करतीं हैं.

हालाँकि अहलुवालिया ने कहा कि यह उनकी निजी राय है लेकिन यह बयान इसलिए ख़ास है क्योंकि वो भारत के मुख्य नीति निर्माताओं में से एक माने जाते हैं.

अहलुवालिया ने यह भी कहा कि अगर कुछ मुल्क आईएमएफ़ के पास जाना नहीं चाहते तो फिर वो द्विपक्षीय समझौतों से अपने लिए संसाधन जुटा सकते हैं.

भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे मुल्क लंबे समय से आईएमएफ़ से अपने लिए ज़्यादा वज़नदार भूमिका की मांग कर रहे हैं. अहलुवालिया ने इस अवसर पर यह भी कहा कि ऐसे संकटों का सही ढंग से हल निकालने के लिए आईएमएफ़ को और संतुलित होने की ज़रुरत है.

'हालात नाज़ुक'

योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि यूरोपीय संकट का असर भारत से ज़्यादा उन मुल्कों से होगा जिनका पूरा व्यापार यूरोप के साथ होता है. अहलुवालिया ने कहा," भारतीय व्यापार बहुत विविध है लेकिन यूरोप का असर भारत पर भी होगा. यह सबको समझना होगा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र रही है और लोगों को यह नहीं लगना चाहिए कि सरकारें इस संकट से निपटने के काबिल नहीं हैं."

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Image caption मोंटेक सिंह अहलुवालिया भारत के मुख्य नीति निर्माताओं में से एक हैं

अहलुवालिया ने कहा कि भारत को उम्मीद है कि जी-20 के सदस्य यह समझेगें कि भारत सही आर्थिक रास्ते पर चल रहा है. उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन उस पर टिपण्णी करते हुए कहा,"भारत का आयात निर्यात असंतुलित नहीं है, भारत की मुद्रा की दर तयशुदा नहीं है और हमारा चालू खाते का घाटा यह दर्शाता है कि हम दुनिया के विकास में ज़्यादा मदद दे रहे हैं."

अहलुवालिया ने माना कि जी-20 भारत के बजट घाटे को सही करने को कह सकता है लेकिन से स्वीकार करता है और इसे कम करने के सभी प्रयास कर रहा है.

कुल मिलाकर जी 20 की बैठक में जाने के पहले अहलुवालिया ने यह साफ़ कर दिया कि भारत दुनिया के अस्सी फ़ीसदी आर्थिक संसाधन रखने वाले इन 20 देशों के समूह की बैठक में नए अंदाज़ और भरपूर विश्वास के साथ जाएगा.

फ़्रांस में भारत एक दर्शक की हैसियत से नहीं बल्कि एक भागिदार की हैसियत से बैठक में मौजूद होगा.

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