मरते समय गद्दाफ़ी नाराज़ और निराश थे

  • 31 अक्तूबर 2011
इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption गद्दाफ़ी का शव

जब आप मिसराता में घुसते हैं, तो आपको चारों तरफ़ बमों से हुई बरबादी दिखाई देती है. मुख्य सड़क पर मलबे के ढ़ेर को सामने कुछ लोग गंदे नारंगी सोफ़े पर बैठे हुए हैं.

जीवन का अकेला वास्तविक संकेत है नया नया बना मिसराता म्यूज़ियम, जहाँ गद्दाफ़ी के वफ़ादार सैनिकों से छीने गए हथियार और अनेक विजय चिह्न रखे गए हैं.

लेकिन एक इंसान अब भी लोगों की निगाहों में नहीं आ पाया है. मंसूर धाओ इब्राहीम को लीबिया के 'मोस्ट वांटेड' लोगों में से एक माना जाता है.

उनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने ग़द्दाफ़ी के विरोधियों की हत्या, बलात्कार और यातना के आदेश दिए थे.

हमसे बातचीत करने के लिए मंसूर धाओ से हो रही पूछताछ थोड़ी देर के लिए रोक दी जाती है. जब हम उनसे मिले तो वह नंगे पैर पालती मारे ज़मीन पर बैठे हुए थे.

उनके सामने क़ुरान रखी हुई थी और उनके पीछे ख़ून से सना हुआ गद्दा बिछा हुआ था.

कर्नल ग़द्दाफ़ी के खास आदमी रहे मंसूर को उनके साथ सिर्त में पकड़ा गया था. वह पूर्व तानाशाह के आख़िरी घंटों और दिनों की दुर्लभ तस्वीर पेश करते हैं.

उन्होंने बताया, "गद्दाफ़ी नर्वस थे. वह बाहरी दुनिया से कोई संपर्क या बातचीत नहीं कर पा रहे थे. हमारे पास बहुत कम खाना और पानी बचा था."

गद्दाफ़ी एक छोटे कमरे में चहलकदमी कर रहे थे और एक नोटबुक में कुछ लिख रहे थे. हमें पता था कि सब कुछ ख़त्म हो चुका था.

गद्दाफ़ी का कहना था, "अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत को मेरी तलाश है. कोई देश मुझे स्वीकार नहीं करेगा. मैं लीबियाई हाथों से मरना पसंद करूँगा."

आत्मघाती अभियान

मंसूर धाओ ने कहा, "कर्नल गद्दाफ़ी ने फ़ैसला किया कि वह अपने जन्म स्थान जारेफ़ जाएंगे."

मैंने उनसे पूछा, ‘क्या यह आत्मघाती अभियान था? जी हां, वह आत्मघाती अभियान था. मंसूर ने कहा, "हमें लगा कि वह अपने जन्म स्थान पर मरना चाहते थे. उन्होंने यह साफ़-साफ़ तो नहीं कहा, लेकिन वह मरने के उद्देश्य से ही वहाँ जा रहे थे."

लेकिन गद्दाफ़ी की योजना उस समय बेकार हो गई जब उनके काफ़िले पर नेटो ने बमबारी कर दी.

एक ज़माने में लोगों को भयभीत करने वाला तानाशाह आड़ लेने के लिए पानी के एक पाइप में घुस गया. यहीं पर वह मिले और पकड़े गए.

पानी के पाइप के अंदर उनके साथ उनके निजी ड्राइवर हुनैश नस्र थे. जब जेल में हमने उनसे बात की तो वह वही ख़ून से सनी कमीज़ पहने हुए थे, जिसे पहने हुए वह उस दिन घायल हुए थे.

उन्होंने बताया, "गद्दाफ़ी पाइप से बाहर निकले. मैं अंदर ही रहा. मैं निकल ही नहीं सकता था क्योंकि बाहर लड़ाकों की भीड़ लगी हुई थी. वह चिल्ला रहे थे गद्दाफ़ी, गद्दाफ़ी, गद्दाफ़ी."

दोस्त जैसे लोगों का विश्वासघात

मंसूर मानते हैं कि मरते समय गद्दाफ़ी नाराज़ और निराश थे. वे सोचते थे कि उनके लोगों को आख़िरी दम तक उन्हें प्यार करना चाहिए. उनका विश्वास था कि उन्होंने उनके और लीबिया के लिए काफ़ी कुछ किया था.

उनका यह भी मानना था कि टोनी ब्लेयर और सिल्वियो बर्लुस्कोनी जैसे कई लोग, जिन्हें वह अपना दोस्त कहते थे, ने उनके साथ विश्वासघात किया था.

मंसूर ने माना कि गद्दाफ़ी के विरोधियों को यातनाएं दी जाती थी और वह अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के प्रायोजक थे और लॉकरबी बम कांड की योजना उनके नज़दीकी लोगों ने बनाई थी.

उन्होंने बताया कि गद्दाफ़ी का सबसे भयंकर फ़ैसला था 1996 में त्रिपोली की अबू सलेम जेल में क़रीब 1200 राजनीतिक क़ैदियों के सामूहिक नरसंहार का आदेश देना.

अभी यह तय नहीं है कि मंसूर और हुनैश नस्र का भविष्य में क्या हश्र होगा.

संबंधित समाचार