बुंदेलखंड डायरी-2: किवाड़ों पर चढ़ी कुण्डियाँ और इंतज़ार

  • 23 नवंबर 2011
बंद घर

किवाड़ों पर चढ़ी कुंडियाँ और उन पर जड़े ताले गाँव में पहुँचने वाले अजनबियों का सबसे पहले ध्यान खींचते हैं.

जिन घरों में लोग रहते हैं वहाँ औरतें घर के बाहर झाड़ू-बुहार में जुटी हैं. रात भर पेड़ों से गिरी सूखी पत्तियाँ, टहनियाँ और सूखी घास के तिनकों को बुहार कर एक कोने में जलाने के लिए इकट्ठा किया जा रहा है.

कुछ ही देर में गलियों में जगह जगह रखी ढेरियों में से धुआँ उठने लगता है. छोटे छोटे बच्चे अपनी माताओं के काम से फ़ारिग होने के इंतज़ार में घरों की देहरी पर बैठे हैं.

(योजना आयोग के उस दावे कि पड़ताल करने बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी बंदुलेखंड के ललितपुर पहुँचे जिसके अनुसार यदि कोई देहाती व्यक्ति खाने-ख़र्चे पर प्रति दिन 26 रुपए ख़र्च करता है तो उसे ग़रीब न माना जाए. ये है उनके अनुभवों पर आधारित डायरी का दूसरा भाग)

धूल-मिट्टी में सिर से पैर तक सने हुए, बेपरवाह. उन्हें भूख लगी है. माँ काम पूरा करेगी तो कुछ भात-रोटी मिलेगी.

ताले जड़े किवाड़ों की ओर देखकर मैंने किसी से एक शहरी क़िस्म का सवाल किया, “इतनी सुबह घर बंद करके कहाँ चले गए ये सब लोग”? जवाब मिला, “सब बाहर गए हैं, मजूरी करने”.

बुंदेलखंड डायरी-1: एक छलावा पैदा करती हरयाली

बुंदेलखंड के अधिकतर गाँवों का यही हाल है. पूरे के पूरे परिवार या फिर कुछ सदस्य मेहनत-मज़दूरी करने के लिए दिल्ली, आगरा, राजस्थान की ओर निकल जाते हैं.

उम्मीद

Image caption बाहर से आए लोगों को देख गाँव की महिलाएँ आ जुटीं.

वहाँ से कुछ पैसे बचाकर घर भेजते हैं जिससे खेती बाड़ी का काम होता है और दूसरे ख़र्च निकलते हैं. जो लोग घरों में रहते हैं वो सुबह सुबह खेतों में काम करने चले जाते हैं और फिर दिन ढलने तक ही लौटते हैं.

हमारे पहुँचने से पहले ही हरियाँ खेतों की ओर जा चुके हैं.

घर में उनकी बहू और उसके तीन छोटे छोटे बच्चे हैं. एक धोती को लकड़ी की बल्ली से बाँध कर झूला बनाया गया है जिसमें दो महीने के अपने भाई को झुला रही है छह एक बरस की भारती.

उससे दो तीन साल बड़ा भाई सोनू और एक चार साल की बहिन शिवानी आस पास मौजूद हैं.

अजनबियों को देखकर घर में पड़ोस की महिलाएँ एकजुट होने शुरू हो गई हैं. जिस तरह से लोग एक एक करके आ रहे हैं, उसके भान हो जाता है कि गाँव के लोग सरकारी मीटिंगों के आदी हैं.

या फिर ग़ैर-सरकारी संगठन या एनजीओ कार्यकर्ता यहाँ मीटिंग करने आते रहते हैं.

सभी के चेहरों पर एक उम्मीद का भाव है – कि हो सकता है इस बार शहर से आए साहिब लोग उनकी कुछ बात सुन लें. सब महिलाएँ हरियाँ के घर के आँगन में नीचे ज़मीन पर बैठ गई हैं.

सबके सिर उनकी मैली पर रंगीन साड़ियों से ढँके हुए हैं. बहुतों ने चेहरे भी ढक रखे हैं. हमारे लिए खाटें बिछाई गई हैं. उन पर बैठने से हमारा रुतबा सरकारी हाकिमों जैसा हो जाता है. मेरे लिए ये असमंजस की स्थिति है.

बिन बुलाए मेहमान

Image caption गाँव के बहुत से लोग अपनी शिकायतें लेकर पहुँचे.

हमें हरयाँ का इंतज़ार है. उन्हें बुलाने के लिए एक बच्चे को पहाड़ी के पार खेतों में भेज दिया गया है. हरियाँ आएँ तो उनके और उनकी खेती-किसानी के बारे में कुछ चर्चा शुरू हो. पर फ़िलहाल मेरा सामना हरदास से है.

आसपास जुटी भीड़ देखकर धोती-बंडी पहने, लगभग 70 पार के हरदास अपनी बुलंद आवाज़ में कुछ उदघोषणा से करते हुए चले आए: "आज गरीबन के बीच रामजी चले आए. आज दरबार भरा है. आज भगवान ने आपको हमारे सामने कर दिया है."

सिर्फ़ मैंने उन्हें अचरज भरी निगाह से देखा, ग्रामीणों ने हरदास और उनकी उदघोषणाओं को नज़रअंदाज़ कर दिया. वो यहाँ के ग्राम प्रधान रह चुके हैं.

बहुत देर से दरवाज़े के बाहर चौखट से लगकर हरदास की पत्नी उनके इस नाट्यकर्म को कुढ़ते हुए देख रही हैं. जब उन्हें लगता है कि हरदास किसी क़ीमत पर चुप होने को तैयार नहीं हैं, वहीं नीचे से छोटे छोटे कंकर मुट्टी में भरकर उनकी पत्नी ग़ुस्से से अपने पति को बुरा-भला कहते हुए आक्रामक मुद्रा में अंदर आती हैं.

पर हरदास विचलित नहीं हैं. मुट्ठी के पत्थर अपने पति को मारने का उपक्रम करते हुए लगभग 70 साल की पोपले मुख वाली ये महिला तगड़ी आवाज़ में पति को डाँटती हैं.

हरदास अब भी विचलित नहीं हैं. दोनों एक दूसरे को देखते हैं और फिर पोपले मुख से खिलखिला कर एक दूसरे की शरारत पर हँस पड़ते हैं. गाँव के लोग तटस्थ बने हुए हैं.

तभी पतली-दुबली काया और कुछ लंबे से कद के हरियाँ वहाँ पहुँचते हैं. ऊपर एक बंडी और नीचे गमछा लपेटे, मोटी मूछों और कुछ बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी वाले हरियाँ अपने घर पर लगी भीड़ देखकर कुछ हतप्रभ ज़रूर दिखते हैं मगर आश्चर्यचकित नहीं. हम उन्हीं के “बिन बुलाए मेहमान होंगे.”

(जारी...)

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