ये रास्ता हताशा की ओर जाता है

शिवानी

लगभग चार वर्ष की शिवानी के बदन पर सिर्फ़ पीले रंग की एक क़मीज़ है. पथरीली पहाड़ की चोटी तक ले जाने वाले नुकीले कंकड़ भरे रास्ते में अपने दादा-दादी के पीछे पीछे नंगे पाँव चढ़ना और फिर उस पार उतरना उसके लिए रोज़ाना की मजबूरी है.

इस सफ़र के दौरान न वो बच्चों की तरह ज़िद करती है, न खेलती है, न भागती-दौड़ती है. सिर्फ़ चेहरे पर उदासी लिए चलती रहती है. उसके दादा हरियाँ कहते हैं इन बच्चों को हम घर पर अकेले नहीं छोड़ सकते.

ये सफ़र शिवानी और गेवरा गाँव के उस जैसे दूसरे कई बच्चों की मजबूरी इसलिए है कि जब उनके माता-पिता और परिवार के दूसरे बड़े लोग रोज़ाना सुबह खेतों में जाते हैं तो छोटे बच्चों की देखभाल करने वाला कोई घर में नहीं रहता.

फिर भी गाँव में ऐसे बच्चे दिख जाते हैं जिनके गले में सुतली के सहारे एक चाबी लटकी रहती है.

एक ऐसे ही उदास चेहरे वाले बच्चे से शाम को मुलाक़ात होती है. वो हाल ही में बीमारी से उठा है. मक्खियाँ उसकी दोनों आँखों पर लगभग हर समय चिपकी रहती हैं. उन्हें उड़ाते उड़ाते थक चुका तीन-चार साल का ये बच्चा अब उनका आदी हो चुका है.

'चौकीदार'

Image caption गाँव के बहुत से बच्चे स्कूल नहीं जा पाते.

उसके गले में एक धागे के सहारे चाबी लटकी है. उसे देखकर मैं हरियाँ से पूछता हूँ कि चाबी बच्चे के गले में क्यों है?

“ये घर का चौकीदार है”, हरियाँ गंभीरता से बताते हैं.

बच्चे की माँ कुछ ही समय पहले टीबी के कारण मर गई. अब उसके घर में सिर्फ़ बूढ़े दादा-दादी हैं जो सुबह काम पर निकल जाते हैं और चाबी बच्चे के गले में लटकी रहती है. वो दिन भर गाँव में घर घर डोलता रहता है.

पर हरियाँ अपने घर के बच्चों को अकेले नहीं छोड़ते. सभी खेत पर जाते हैं.

“पर बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते? आजकल तो सरकार ने काफ़ी सुविधाएँ दे दी हैं?” मेरा सवाल हरिया को शायद कुछ अटपटा लगा, बोले: “साहब, देखभाल कौन करेगा उनकी जब वो स्कूल से लौटेंगे दोपहर में. हम तो खेतों पर होते हैं और खेत दूर पहाड़ के पार हैं.”

पथरीले पहाड़ी रास्ते में हरिया और उनके परिवार के साथ चढ़ाई चढ़ते हुए मेरे ज़ेहन में सिर्फ़ एक सवाल था: आदिवासी-दलितों के खेत गाँव से तीन किलोमीटर दूर इस पथरीली पहाड़ी के उस पार बैतवा नदी के किनारे पर ही क्यों हैं, जबकि दूसरी जातियों की ज़मीनें गेवरा गाँव के आसपास ही समतल इलाक़े में?

गाँव की ऊँची जातियों के ज़्यादातर किसान और कुछ दलित भी बस्ती से सटे खेतों में काम करते हैं जबकि आदिवासियों के परिवार हर सुबह गाँव से दूर पहाड़ी के पार अपने खेतों में आते हैं.

इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन हरियाँ बताते हैं कि जिनके पास लेखपाल को देने के लिए पैसे रहे होंगे उन्होंने ज़मीन आवंटन के समय अच्छी अच्छी जगहों की ज़मीन अपने नाम करवा ली.

अर्थशास्त्र

हरियाँ के पिता छंदी को पहले अच्छी जगह पर ज़मीन एलॉट की गई थी लेकिन फिर वो ज़मीन एक बंदूक़ कारख़ाने के लिए अधिग्रहीत कर ली गई.

हरियाँ दबी ज़बान से बताते हैं कि फिर गाँव के ठाकुरों ने नाराज़ होकर उनके पिता को गाँव से खदेड़ दिया था.

हरिया याद करते हैं, “जब हमारे पिताजी दुबारा से गाँव लौट कर आए तब हम छोटे छोटे बच्चे थे.” यानी आज से पचास साठ पहले गाँव में आदिवासियों का जीना दूभर था.

लौटने पर दूसरे आदिवासियों के साथ छंदी को भी नदी किनारे की ज़मीन मिली.

खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए हम अब पहाड़ी की चोटी पर पहुँच चुके हैं. यहाँ से बुंदेलखंड के इस हरे-भरे इलाक़े का 360 डिग्री में विहंगम दृश्य दिखता है.

भरी हुई बेतवा नदी अपने दोनों ओर की ज़मीन को सींचते हुए आगे बढ़ती है. दूर दूर तक खेतों में उगी फ़सल और पेड़ों की हरितिमा को देखकर ये अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि इसे हिंदुस्तान के सबसे ग़रीब इलाक़ों में गिना जाता है.

लेकिन ये हरा भरा दृश्य इसी साल का है. पिछले पाँच साल से बुंदेलखंड का ज़्यादातर इलाक़ा सूखे की चपेट में था.

इस बार चौमास में बारिश हुई तो बेतवा नदी के आसपास की ज़्यादातर ज़मीन डूब में आ गई. मॉनसून ख़त्म होने पर पानी उतरा तो हरियाँ ने अपने खेतों में मूँगफली की फ़सल उगाई. और अब मूँगफली उतारने और अगली फ़सल के लिए खेत तैयार करने का समय है.

“ये खेती का काम है साहब”, हरियाँ अपनी साँसे थामने की कोशिश करते हुए बोले, “जितना भी कर लो कभी ख़त्म नहीं होता.”

मेरे दिमाग़ में खेती का अर्थशास्त्र घूम रहा है.

(जारी...)

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