'पूर्वोत्तर के राज्यों में फैल रहे हैं माओवादी'

  • 12 नवंबर 2011
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Image caption पूर्वोत्तर के संगठनों से माओवादियों के संबंध की बात पहले भी की जाती रही है

दिल्ली स्थित 'इंस्टीट्यूट ऑफ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट' की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वोत्तर भारत में माओवादी अपनी क्षमता बढ़ाने के प्रयास में काफ़ी सफल हुए हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार अपने विस्तार के लिए माओवादी एक तरफ जहां पूर्वोत्तरी भारत के कई अलगाववादी संगठनों के साथ साथगांठ कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ अरुणाचल और असम जैसे राज्यों में चल रहे कुछ आंदोलनों का भी वो हिस्सा बन रहे हैं.

पिछले कुछ दिनों में ऐसे कई लोगों को पूर्वोत्तर में गिरफ्तार किया गया है, जिन्हें माओवादियों का सहयोग मिला हुआ है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वोत्तर के उन इलाकों में जहां अलगाववादी संगठनों का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है वहां माओवादी अपना प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ाने में लगे हैं.

स्थानीय संगठनों का साथ

इस संबंध में ख़ुफ़िया विभाग को पहले से जानकारी है लेकिन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के रिसर्च फेलो अजीत कुमार के अनुसार उल्फा, एनडीएफबी, एनएससीएन और पीएलए जैसे संगठनों के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने अपनी सांठगांठ काफी पुख्त़ा कर ली है.

अजीत कहते हैं, "इन दिनों माओवादियों को मध्य-भारत के अपने गढ़ वाले इलाक़े में काफी दबाव झेलना पड़ रहा है, जिसके कारण वो पूर्वोत्तर भारत में विस्तार करने की कोशिश में है और उल्फा, एनडीएफबी,एनएससीएन और पीएलए जैसे संगठनों से उन्हें आसानी से चीनी हथियार मिल रहे हैं."

दूसरी तरफ पूर्वोत्तर के कई संगठन अपने कार्यकर्ताओं को मध्य-भारत के जंगलों में प्रशिक्षण के लिए भेज रहे हैं. यहां पूरे उत्तर-पूर्व के इलाक़े को हथियार लाने के माध्यम की तरह देखे जाने के बावजूद इससे इनकार नहीं किया सकता है कि वैचारिक स्तर पर भी माओवादियों का अलगाववादी संगठनों के साथ नाता जुड़ रहा है, जिसके बारे में माओवादी पार्टियां खुलेआम बयान भी दे रही है.

अजीत कहते हैं कि अलगाववादी संगठनों के साथ साठगांठ बढ़ाने के अलावा माओवादी कार्यकर्ता कई जन-आंदोलनों के साथ भी जुड़ गए हैं, अरुणाचल प्रदेश और असम जैसे राज्यों में ये माओवादी कार्यकर्ता कई आंदोलनों को संगठित करने में भी जुटे हैं.

वो बताते हैं कि कैसे पूर्वोत्तर में विद्रोह की घटनाएं तो लगातार कम होती जा रही हैं लेकिन लगभग सभी राज्यों में जन आंदोलन शुरु हो गया है, जो यहां के लिए एक नई प्रवृत्ति है.

जनआंदोलनों के ज़रिए पैठ

उदाहरण के लिए असम के कई इलाक़े में अलग ज़िले की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा है, मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी, अरुणाचल में दिबांग घाटी ऊर्जा परियोजना का भी विरोध हो रहा है. ख़ास बात ये है कि इन सभी आंदोलनों को ना सिर्फ जनसमर्थन मिल रहा है बल्कि इन जन-आंदोलनों में माओवादी भी बढ़-चढ़ कर शामिल हो रहे हैं ताकि अपनी पार्टी का विस्तार कर सकें.

पूर्व पुलिस अधिकारी सुबीर दत्ता का कहना है कि वर्ष 2004 में एमसीसी और जनयुद्ध के मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की स्थापना करने से पहले से ही असम के कुछ इलाकों में एमसीसी का प्रभाव रहा है.

उनका कहना है कि एमसीसी का उत्तर पूर्व भारत के अलगाववादी संगठनों से तब से ही नाता रहा है, पर नई पार्टी बनने के बाद से इस विषय पर ज़ोर दिया गया और वर्ष 2008 में पहली सफलता मिली जब मणिपुर के पीएलए के साथ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने साझा बयान जारी किया.

वे कहते हैं कि इसके बाद धीरे-धीरे उल्फा और दूसरे संगठनों के साथ भी माओवादी कार्यकर्ता संपर्क बनाने लगे. भारत सरकार के खिलाफ़ पूर्वोत्तर के इन संगठनों के संघर्ष को माओवादी पार्टियों का समर्थन मिला, और बदले में ये उल्फा जैसे संगठन माओवादियों को सैद्धांतिक और सैन्य सहायता मुहैया कराते रहे. पुलिस सूत्रों के अनुसार पिछले दो-तीन महीनों में असम और पूर्वोत्तर के अन्य इलाकों से तकरीबन 20 से भी ज़्यादा माओवादियों को गिरफ्तार किया गया. इनमें ऐसे भी लोग शामिल हैं जो किसी ना किसी आंदोलनों से जुड़े हुए हैं.

हालांकि पूर्वोत्तर के जनआंदोलनों से जुड़े हुए लोग मानते हैं कि उनपर माओवादी से जुड़े होने का लेबल लगाने के पीछे की मंशा उनके आंदोलन को बदनाम करना है.

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