मिस्र: सेना के प्रस्तावों के ख़िलाफ़ रैलियाँ

  • 19 नवंबर 2011
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मिस्र में काहिरा और अलेक्ज़ेंड्रिया में हज़ारों लोगों ने सेना के प्रस्तावित संवैधानिक बदलावों के ख़िलाफ़ रैलियों में हिस्सा लिया है. सेना और सुरक्षाबलों ने हस्तक्षेप नहीं किया है. विभिन्न राजानीतिक विचारधारा वाले लोग तहरीर चौराहे पर इकट्ठा थे.

प्रस्ताव के मुताबिक कैबिनेट चाहती है कि सेना को संवैधानिक वैधता का रक्षक घोषित कर दिया जाए.

आलोचकों का कहना है कि शब्दावली से ऐसा लगता है कि नया राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी बड़ी नीतियों पर अंतिम निर्णय सेना का ही होगा.

फ़रवरी में हुस्नी मुबारक को सत्ता से हटाए जाने के बाद से मिस्र में सैन्य परिषद का ही शासन है. नवंबर में संसदीय चुनाव होने हैं.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि मिस्र में इस बात को लेकर बड़े पैमाने पर नाराज़गी है कि मुबारक के जाने के बाद भी आम लोगों की ज़िंदगी में सुधार नहीं आया है.

प्रदर्शनों में सबसे ज़्यादा विरोधी स्वर रूढ़ीवादी गुट मुस्लिम ब्रदरहुड के हैं न कि युवा वर्ग का जो साल के शुरु में हुए प्रदर्शनों में सबसे आगे थे.

सेना से नाराज़गी

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक तहरीर चौराहा मुस्लिम ब्रदरहुड की फ़्रीडम एंड जस्टिम पार्टी और कट्टरवादी सलाफ़ी गुटों के बीच बँटा हुआ है. दोनों ने अपने अलग अलग स्टेज लगाए हुए हैं.

ब्रदरहुड ने अब तक सत्ताधारी सैन्य परिषद सीधे सीधे टकराव का रास्ता नहीं अपनाया है.

लेकिन उसने कहा है कि अगर सेना को स्थाई राजनीतिक अधिकार देने का प्रस्ताव खारिज नहीं किया गया तो प्रदर्शन तेज़ हो जाएँगें.

तहरीर चौराहा ही वो ऐतिहासिक जगह थी जहाँ मुबारक के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे.

मुस्लिम ब्रदरहुड मिस्र का सबसे संगठित राजनीतिक गुट है और माना जा रहा है कि 28 नवंबर के चुनाव ये पार्टी अच्छे नतीजे लाएगी.

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