इतिहास के पन्नों में एक दिसंबर

इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि आज ही के दिन एक ओर जहां इसराइल के संस्थापक डेविड बेन गुरियन की मौत हो गई थी, वहीं अमरीकी राज्य अलबामा में एक काली महिला पर इसलिए जुर्माना लगाया गया, क्योंकि उसने अपनी सीट एक गोरे व्यक्ति के लिए ख़ाली करने से मना कर दिया था.

1973: इसराइल के संस्थापक की मौत

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Image caption डेविड बेन गुरियन इसराइल के संस्थापक थे

एक दिसंबर 1973 के दिन इसराइल के संस्थापक और पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन की 87 साल की उम्र में मौत हो गई थी.

उनकी मौत ब्रेन हैमरेज के कारण हुई. बेन गुरियन ने अपना जीवन यहूदीवाद और इसराइल के निर्माण की कोशिशों को समर्पित कर दिया था.

उनका ये सपना आख़िरकार 14 मई 1948 के दिन पूरा हुआ. उन्होंने साल 1948 से 1963 तक अपने नवजात देश का नेतृत्व किया, हालांकि इसके बीच एक बार 1953 में उन्होंने इस्तीफ़ा भी दिया था.

साल 1955 में उन्होंने रक्षा मंत्री के रूप में राजनीति में वापसी की और उसके बाद हुए चुनावों में वे एक बार फिर प्रधानमंत्री बने.

उनकी मौत पर देश-विदेश के नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया.

बेन गुरियन ने दो युद्धों के दौरान इसराइल का नेतृत्व किया, जिसमें 1956 में सुएज़ नहर को लेकर हुआ विवाद भी शामिल था.

हालांकि उनका राजनीतिक जीवन बेहद विवादस्पद रहा, क्योंकि उन पर आरोप लगाया जाता था कि 1967 के युद्ध के बाद उन्होंने पड़ोसी देशों के कब्ज़ा किए हुए क्षेत्रों को वापस नहीं लौटाया.

जब उनकी मौत हुई, तब इसराइल और सीरिया के बीच गोलान हाइट्स के इलाक़े को लेकर तनाव बना हुआ था. इसराइल ने 1967 में गोलान हाइट्स पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

1955: काली महिला ने रंगभेद से जुड़े क़ानून को चुनौती दी

Image caption रंगभेद के ख़िलाफ़ रोज़ा पार्क्स की लड़ाई में मार्टिन लूथर किंग ने उनका साथ दिया था

आज ही के दिन 1955 में अमरीकी राज्य अलबामा में एक काली महिला को इसलिए ग़िरफ़्तार कर लिया गया था, क्योंकि उन्होंने बस में अपनी सीट एक गोरे आदमी के लिए ख़ाली करने से इनकार कर दिया था.

रोज़ा पार्क्स नाम की इस महिला पर जुर्माना लगाया गया था क्योंकि उसने उस क़ानून का हनन किया था, जिसमें लिखा था कि काले लोगों को गोरे लोगों को बस में खड़ा देख कर उन्हें अपनी सीट सौंप देनी चाहिए.

ये पहली बार नहीं था, जब रोज़ा पार्क्स ने इस क़ानून को तोड़ा था. उनके बार-बार इस क़ानून को तोड़ने की वजह से स्थानीय बस ड्राइवर भी उन्हें पहचानने लगे थे और कभी-कभी तो उन्हें बस में चढ़ने से मना कर देते थे.

रोज़ा एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जो काले लोगों के अधिकारों के लिए काम करती थीं. उनकी ग़िरफ़्तारी के पांच दिनों बाद हज़ारों काले नागरिकों ने बसों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया. रोज़ा पर 10 डॉलर का जुर्माना लगाया गया था, जिसके बाद उन्होंने इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी थी.

उसी शाम मार्टिन लूथर किंग ने लोगों की भीड़ को संबोधित किया और उनसे अपील की कि वे अपनी बहिष्कार मुहिम जारी रखें.क़रीब 40,000 काले नागरिकों ने बसों का बहिष्कार किया, जो 381 दिनों तक चला. 20 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि बसों में होने वाले भेद-भाव पर रोक लगाई जानी चाहिए.

1957 में नौकरी से निकाले जाने के बाद वे एक डेमोक्रैटिक सांसद जॉन कॉन्यर्स की ख़ास सहायक बनीं रहीं. 2005 में रोज़ा की मृत्यु हो गई, लेकिन अपने जीवन में वे हमेशा नागरिक अधिकारों के लिए काम करती रहीं.

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