एचआईवी से लड़ने के लिए ड्रग मुक्त टैबलेट

एचआईवी इमेज कॉपीरइट AP
Image caption एचआईवी के संक्रमण से लड़ने के लिए सुई की जगह टैबलेट का इस्तेमाल

दुनियाभर में लोगों को एचआईवी संक्रमण से बचाने के लिए कई तरह के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं.

विश्व एड्स दिवस पर एक ऐसा ही ख़ास अभियान गुजरात के सूरत शहर में शुरू किया गया, जहाँ 600 से ज़्यादा नशा करने वालों को गुजरात सरकार की तरफ से कोकीन और हेरोइन मुक्त गोलियां बांटी गई.

राज्य सरकार का कहना है कि इस अभियान का मक़सद नशे के आदी बन चुके लोगों को उस संक्रमित सुई से बचाना है, जिसके इस्तेमाल से ये लोग एचआईवी संक्रमण के शिकार हो रहे हैं.

इस टैबलेट में मेथाडोन और ब्यूप्रेनॉरफाइन के अंश होंगे, जिनका क़ानूनी तौर पर नशे के इलाज में प्रयोग किया जाता है.

ये अभियान संयुक्त रुप से नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइज़ेशन और गुजरात सरकार की मुहिम है, जो गुजरात से पहले कई अन्य राज्यों में भी चलाया जा रहा है.

अभियान को चलाने वाली गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज सूरत में मनोरोग विभाग की प्रमुख डॉ. ऋतांभरा मेहता कहती हैं कि नशा करने वालों को ये टैबलेट देने का मकसद उनको संक्रमित सुई का प्रयोग करने से रोकना है.

डॉ. मेहता के अनुसार इस टैबलेट के इस्तेमाल से दो मकसद पूरे किए जा सकेंगे. पहला नशे के मरीज़ों को जहां एचआईवी संक्रमण से बचाया जा सकेगा वहीं आगे चलकर उनकी नशे की आदत को भी छुड़ाने में इससे मदद मिलेगी.

क्योंकि इससे पहले इन लोगों को स्टरलाइज़ सुई दिए जाने के बाद भी ये पाया गया था कि एचआईवी संक्रमण के दर में कोई कमी नहीं आई थी.

कमी

दूसरी ओर एड्स वायरस की खोज करने के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक प्रोफेसर फ़्रांसवाज़ बरे सीनूसी अंतरराष्ट्रीय फ़ंडिंग एजेंसी के उस फ़ैसले से काफी नाराज़ है, जिसके तहत एचआईवी की रोकथाम के लिए कोष में कमी करने का फ़ैसला किया गया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लंबे समय से दुनिया के ग़रीब देशों को एड्स से लड़ने के लिए दिया जाने वाला अनुदान हमेशा बढ़ाया जाता रहा है, लेकिन पिछले साल पहली बार ऐसा हुआ है कि ये अनुदान कम पड़ गया है.

1983 में अपने एक सहयोगी के साथ एचआईवी वायरस के बारे में पता लगाने पर सीनूसी को तीन साल पहले चिकित्सा क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

'प्रगति सुखद'

बीबीसी की स्वास्थ्य संवाददाता जेन ड्रिपर के अनुसार फ़्रांसवाज़ सीनूसी इस बात पर ख़ुश हैं कि मौजूदा समय में विज्ञान ने काफ़ी प्रगति कर ली है.

सीनूसी के अनुसार विभिन्न परीक्षणों से भी ये साबित हो रहा है कि दवाओं के ज़रिए भी इस वायरस के संक्रमण को प्रभावी तरीक़े से रोका जा सकता है.

जबकि नए आंकड़ों से ये पता चलता है कि एड्स को काबू करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद में पिछले साल 10 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है.

अंतरराष्ट्रीय कोष ने भी पिछले सप्ताह ये ऐलान किया है कि वो 2014 से पहले कोई नया अनुदान नहीं दे सकता है.

सीनूसी ने कहा कि कुछ देश पहले के वायदे को पूरा नहीं कर पाए हैं, जो बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता.

उनका मानना है कि एचआईवी के इलाज से संबंधित शोधकार्यों को तेज़ करना बेहद ज़रूरी है, ताकि इस वायरस से पीड़ित लोगों के इलाज की प्रक्रिया उम्रभर ना चलती रहे.

संबंधित समाचार