ग़रीब देश चाहते हैं नई पर्यावरण संधि

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Image caption डरबन में जारी बैठक में किसी तरह के समझौते की उम्मीद नहीं की जा रही है

पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र की बैठक में विकसित और विकासशील देशों में जारी रस्साकशी के बीच कई ग़रीब देशों को लग रहा है कि उन्हें अमीर देशों से वायदे के मुताबिक़ धनराशि प्राप्त नहीं हो सकेगी.

इन मुल्कों को लग रहा है कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि पर जारी कलह के कारण अमीर देश उस धनराशि को देने पर रोक लगा देंगे, जो उन्होंने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए ग़रीब देशों को देने का वायदा किया था.

पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र की बैठक दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में चल रही है.

कोष पर चिंता

पिछले साल मैक्सिको में हुई पर्यावरण बैठक के बाद एक 'ग्रीन पर्यावरण कोष' की स्थापना की बातचीत की गई थी लेकिन इसकी रूपरेखा पर मतभेद के कारण कोष की शुरूआत को टाल दिया गया था.

फंड की स्थापना पर सैद्धांतिक रज़ामंदी वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी आने का ख़तरा पैदा होने के बाद भी बनी थी.

लेकिन इस कोष में अमीर देशों की ओर से वो धनराशि कभी नहीं आई, जिसका वादा किया गया था.

वार्ताकार कह रहे हैं कि कम से कम पहले ये उम्मीद तो थी कि अगर बैठक में किसी तरह का समझौता नहीं भी हो पाता है तो कम से कम पर्यावरण कोष पर कुछ प्रगति तो ज़रूर होगी.

उत्सर्जन में कटौती को लेकर जारी मतभेद के बीच ग़रीब देशों ने गुरूवार को ये मांग उठाई है कि एक ऐसी परमाणु संधि पर फ़ौरान बातचीत शुरू की जाए जिसके दायरे में सभी देश हों.

लेकिन अगर ऐसा संभव भी होता है तो ये बातचीत अगले साल की बैठक तक जारी रहेगी लेकिन इन सबके बीच ग़रीब देश पर्यावरण कोष को लेकर बेदल चिंतित हैं.

हालांकि इनमें से कई पर पहले दी गई धनराशि के दुरूपयोग का आरोप भी लगा है.

नई संधि की मांग

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Image caption ये विवाद पुराना है कि सभी देशों के लिए कार्बन गैसों के उत्सर्जन घटाने की सीमा तय हो

चीन और भारत जैसी उभरती आर्थिक शक्तियां लगातार उस अंतरराष्ट्रीय संधि को जारी रखने पर ज़ोर देती रही हैं जिसमें बढ़ते तापमान के लिए ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को ज़िम्मेदार बताया गया है.

उनका तर्क है कि अगले साल ख़त्म हो रही क्योटो संधि एक मात्र क़ानूनी समझौता है जिसमें विकसित देशों से कार्बन उत्सर्जन को कम करने की बात कही गई है.

लेकिन कई विकसित देश एक नए पर्यावरण समझौते की बात उठा रहे हैं.

उनका कहना है कि ग्यारह साल पुरानी क्योटो संधि में विकासशील देशों पर उत्सर्जन को कम करने के लिए किसी तरह की बाध्यता का ज़िक्र नहीं है.

दोनों पक्षों के बीच मतभेदों के कारण डरबन में पिछले हफ़्ते से शुरू हुई बैठक के दौरान किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय समझौते पर सहमति की उम्मीद नहीं की जा रही है.

ग़रीब मुल्कों के वार्ताकारों का कहना है कि गतिरोध का नतीजा होगा किसी तरह की सहमति का नहीं बन पाना, और पर्यावरण पर मंडरा रहे ख़तरे को और गहराना.

उनका कहना है कि इसका सबसे अधिक ख़तरा उन जैसे समुदायों पर पडे़गा.

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