काबुल धमाकों में 50 से ज़्यादा की मौत

काबुल (फ़ाइल फ़ोटो) इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption मुहर्रम के दिन शिया मुसलमानों को पहले भी निशाना बनाया गया है.

अफ़ग़ानिस्तान में हुए दो धमाकों में 50 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. ये धमाके ऐसे समय हुए हैं जब जर्मनी में अफ़ग़ानिस्तान पर सम्मेलन हो रहा है. तालिबान ने हमलों की निंदा की है.

संवाददाताओं के मुताबिक माना जा रहा है कि ये जातीय हमला था और ऐसा अफ़ग़ानिस्तान में पिछले एक अरसे से नहीं हुआ.

पुलिस के अनुसार पहला धमाका काबुल में शिया मुसलमानों के एक धार्मिक स्थल पर हुआ. शिया मुसलमान मुहर्रम मनाने के लिए वहां जमा हुए थे.

पुलिस का कहना है कि धमाका आत्मघाती हमला था. काबुल पुलिस के प्रवक्ता हशमत स्टैनिकज़ई ने 50 लोगों के मारे जाने की पुष्टि कर दी है.

धमाका मंगलवार की सुबह शिया संप्रदाय के एक दरगाह में हुआ जहां सैंकड़ों लोग मुहरर्म मनाने के लिए मौजूद थे.

अफ़ग़ानिस्तान के ही एक और शहर मज़ार-ए-शरीफ़ में भी एक धमाका हुआ जिसमें कम से कम चार लोग मारे गए.

ख़बरों के मुताबिक़ वहां भी मुहर्रम के मौक़े पर शिया मुसलमानों के एक धार्मिक जुलूस में धमाका हुआ है.

धमाका

ये दोनों ही धमाके लगभग एक ही साथ स्थानीय समयानुसार क़रीब 12 बजे हुए थे.

काबुल स्थित बीबीसी संवाददाता क्येंटिन सौमरविल का कहना है कि मारे जाने वालों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.

उनके अनुसार शिया मुसलमानों को निशाना बनाते हुए ये एक सुनियोजित हमला था जिसकी मिसाल पहले नहीं मिलती है.

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने इसकी निंदा करते हुए कहा, ''अफ़ग़ानिस्तान में ऐसा पहली बार हुआ है जब इतने महत्वपूर्ण धार्मिक दिन में इस तरह की आतंकी घटना हुई है.''

अफ़ग़ानिस्तान में शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच तनाव ज़रूर रहता है लेकिन पाकिस्तान और इराक़ की तरह यहां उस पैमाने पर कभी हिंसा नहीं देखी गई है.

पुलिस ने काबुल में एक और हमले को नाकाम करने का दावा किया है.

मज़ार-ए-शरीफ़ में एक मस्जिद में जो धमाका हुआ उसमें बम एक मोटरसाइकिल में रखा था.

बल्ख़ प्रांत के पुलिस उपप्रमुख अब्दुल रउफ़ ताज ने कहा कि धमाका उस वक़्त हुआ जब शिया मुसलमान एक जुलूस में जा रहे थे.

मुहर्रम के दिन को दुनिया भर के मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत के दिन के रूप में मनाते हैं.

ग़ौरतलब है कि वर्ष 680 में इसी दिन इराक़ के करबला में इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ तत्कालीन बादशाह यज़ीद की सेना के हाथों मारे गए थे.उसी दिन की याद में मुसलमान मुहर्रम मनाते हैं.

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