'प्रवासियों के प्रति नकारात्मक रवैया'

  • 6 दिसंबर 2011
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Image caption हालांकि प्रवासन से हर देश की अर्थव्यवस्था को फ़ायदा ही होता है, लेकिन अप्रवासियों के बारे में आम धारणा नकारात्मक ही है.

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि कई देशों में प्रवासियों को नकारात्मक नज़र से देखा जाता है और प्रवासन पर होने वाली बहस का ज़रूरत से ज़्यादा राजनीतिकरण किया जाता है.

संगठन का कहना है कि इन्हीं कारणों के चलते प्रवासन को लेकर आम जनता का नज़रिया कुछ हद तक दोषपूर्ण रहा है.

वैश्विकरण के इस दौर में लोगों के पलायन के चलन में बढ़ोतरी देखने को मिली है, चाहे वो बेहतर नौकरी की तलाश में हो, या बेहतर ज़िंदगी की तलाश में.

रिपोर्ट कहती है कि हालांकि प्रवासन की प्रक्रिया से हर देश की अर्थव्यवस्था को फ़ायदा ही होता है, लेकिन प्रवासियों के बारे में आम धारणा नकारात्मक ही है.

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन यानि आईओएम ने जिन मेज़बान देशों में सर्वेक्षण किया, वहां पाया गया कि स्थानीय लोगों के बीच ये आम धारणा है कि उनके देश में ज़रूरत से ज़्यादा प्रवासी लोग रहते हैं.

सर्वेक्षण में पाया गया कि स्थानीय लोग प्रवासियों की तादाद का अनुमान उनकी वास्तविक आबादी से कहीं ज़्यादा लगाते हैं और कुछ मामलों में तो ये अनुमान वास्तविक प्रवासी आबादी का 300 प्रतिशत से भी ज़्यादा पाया गया.

मसलन, इटली में लोगों को लगता है कि वहां प्रवासियों की तादाद 25 प्रतिशत है, जबकि वास्तव में ये आंकड़ा केवल सात प्रतिशत है.

रिपोर्ट कहती है कि प्रवासन के बारे में ‘ग़लत’ धारणाओं की वजह से प्रवासन से जुड़ी बाकी समस्याएं जैसे कि आवास की कमी और बेरोज़ग़ारी जैसे मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

आईओएम ने चेतावनी दी है कि प्रवासन के मुद्दे पर अगर सकारात्मक और रचनात्मक बहस नहीं की गई, तो प्रवासियों और स्थानीय लोगों के बीच का एकीकरण मुश्किल होगा और साथ ही प्रवासियों के दरकिनार होने का भी ख़तरा है.

भारतीय अप्रवासी

आईओएम की रिपोर्ट कहती है कि साल 2010 में भारत, चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फ़िलिपीन्स में सबसे ज़्यादा आबादी ने बाहर के देशों का रुख़ किया.

यही कारण है कि इन पांच देशों में सबसे ज़्यादा पैसा भी आया. मसलन भारत में 51 अरब डॉलर से ज़्यादा की रकम बाहरी देश से भेजे गए पैसों के रूप में आई.

2009 के आंकड़ों को देखें, तो भारत से 97 प्रतिशत प्रवासी और पाकिस्तान से 87 प्रतिशत प्रवासियों ने खाड़ी सहयोग संगठन यानि जीसीसी के देशों में पलायन किया.

मध्य-पूर्वी देशों में तेल के बढ़ते दामों की वजह से वहां वैश्विक मंदी का असर नहीं देखा गया था. ये भी एक कारण है कि कई देशों के लोगों ने खाड़ी के देशों का रुख़ किया.

बाहरी देशों में होने वाले भेदभाव की पुष्टि करते हुए ब्रिटेन से लौटे कार्तिके शर्मा ने कहा, “जब ब्रिटेन में पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं वहां नौकरी की तलाश में निकला तो पाया कि वहां ज़्यादातर नौकरियों में स्थानीय लोगों औऱ यूरोप से आए प्रवासियों को तवज्जो दी जाती है. आर्थिक मंदी के वातावरण में मुझे भी कहीं न कहीं ऐसा लगा कि भारतीय प्रवासियों को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है. स्थानीय लोगों को लगता है कि हम उनके लिए बनाए गए अवसरों को उनसे छीनने की कोशिश कर रहे हैं.”

लेकिन ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय अप्रवासी एम के राजू का कहना है कि उन्हें केवल कुछ समय के लिए भेदभाव का सामना करना पड़ा.

अपने अनुभव का बयान करते हुए एम के राजू कहते हैं, “ऑस्ट्रेलियाई लोग हमसे बहुत अलग होते हैं. वे काफ़ी आरामपसंद होते हैं. चूंकि मेरा काम करने का तरीका बहुत अलग था, तो शुरुआत में मुझे ऐसा लगा था कि वे लोग मेरी ओर नकारात्मक रुख़ अपना रहे हैं, लेकिन कुछ समय बाद वो शंका दूर हो गई. हालांकि छोटी-मोटी घटनाएं होती हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ऑस्ट्रेलिया में बाकी बाहरी देशों के मुकाबले प्रवासियों की ओर लोगों का रवैया सकारात्मक ही है.”

अप्रवासी और बेरोज़कारी

रिपोर्ट कहती है कि बाहर से आए लोग स्थानीय लोगों के मुकाबले बेरोज़गारी का ज़्यादा शिकार होते हैं.

उदाहरण के तौर पर स्पेन के आंकड़ें देखे जाएं, तो 2007 के अंत में वहां 12.4 प्रतिशत प्रवासी लोग बेरोज़गार थे, जबकि स्थानीय लोगों में ये आंकड़ा 7.9 प्रतिशत था.

लेकिन 2010 में स्पेन में 30.2 प्रतिशत अप्रवासी लोग बेरोज़गार पाए गए, जबकि स्थानीय लोगों में ये औसल 18.1 पाई गई.

ब्रिटेन में अप्रवासियों पर विभिन्न रुप का असर देखने को मिला. जहां मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों से आए लोगों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं देखने को मिला, वहीं अफ़्रीका, बांग्लादेश और पाकिस्तान के प्रवासियों पर उनके मुकाबले ज़्यादा प्रतिकूल असर पड़ा.

दक्षिणि इटली में तो बढ़ती बेरोज़गारी की वजह से सामाजिक तनाव और प्रवासियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी देखे गए थे.

कारण

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन की रिपोर्ट कहती है कि प्रवासियों के बारे में हो रहे विकृत प्रचार की वजह से उनके ख़िलाफ़ प्रतिरोध बढ़ रहा है.

संगठन के मुताबिक़ प्रवासियों को ख़ास तरह के ख़ाकों में डाला जाना, उनके साथ भेदभाव औऱ उनके बारे में पूर्वाग्रह से ग्रसित विचारों को फ़ैलाया जाता है.

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के महानिदेशक विलियम लेसी स्विंग का कहना है, “आम जनता को प्रवासी चलन के बारे में बताना ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिससे समाज में बेहतर समीकरण और विविधता की उम्मीद की जा सकती है.”

रिपोर्ट कहती है कि सर्वेक्षण के नतीजे उस अवधारणा से भी प्रभावित लगते हैं कि बाहर से आने वाले लोग स्थानीय लोगों की नौकरियां छीन रहे हैं.

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