अमरीका की नज़र थी पर भनक नहीं लगी..

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Image caption 1974 में राजस्थान के थार रेगिस्तान में भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया था.

अमरीकी ख़ुफिया एजेंसियों के गोपनीय दस्तावेज़ों से पता चला है कि 1950 के दशक से भारत के परमाणु कार्यक्रम पर नज़र होने के बावजूद वो 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बारे में जानकारी नहीं जुटा सकीं.

अमरीका के नेशनल सिक्यूरिटी आर्काइव को मिले ये 40 दस्तावेज़ अमरीकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए, अमरीकी रक्षा विभाग, लिवरमोर राष्ट्रीय लैबोरेट्री और रक्षा ख़ुफिया एजेंसी के हैं.

1958 से 1998 के बीच लिखे गए इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि अमरीका ने भारत के नागरिक और सैन्य परमाणु कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने की कोशिश की थी.

40 वर्षों के दौरान भारत की परमाणु गतिविधियों पर ख़ुफिया तंत्र की नज़र से अमरीका को वो सब जानकारी हासिल हुई जो सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध ज़रियों से नहीं मिल सकती थी.

इसके बावजूद नीतिगत फ़ैसले लेने वाले वरिष्ठ अमरीकी अधिकारियों को भारत के परमाणु परीक्षणों के बारे में नहीं चेताया जा सका.

क्या भारत में क्षमता है?

इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 1974 से कई वर्ष पहले ही अमरीकी ख़ुफिया तंत्र ने भारत के परमाणु परीक्षण करने की क्षमता और संभावना का विश्लेशण किया था.

इसके लिए कई संस्थाओं, यूरेनियम और खारे पानी जैसे संसाधनों की उप्लब्धता, परमाणु रिऐक्टर का निर्माण इत्यादि के साथ-साथ भारत के राजनेताओं पर आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय दबावों की जानकारी जुटाई गई थी.

दस्तावेज़ों में भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले वैज्ञानिक होमी भाभा के बारे में भी जानकारी मिलती है.

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Image caption 11 मई 1998 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक पत्रकार वार्ता में तीन परमाणु परीक्षणों की जानकारी दी थी.

बताया गया है कि भाभा इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने ब्रिटेन के केम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए लेकिन 1935 में आखिरकार भौतिक विज्ञान में डॉक्टर की उपाधि के साथ लौटे.

1974 के बाद 1998 में फिर हवा नहीं लगी

तमाम विश्लेषण के बावजूद अमरीका को 1974 के भारत के परीक्षण की जानकारी परीक्षण होने के बाद ही मिली. इसके 14 वर्ष बाद एक बार फिर अमरीका को 1998 के परीक्षण की हवा तक नहीं लगी.

1974 के टेस्ट के बाद परमाणु बम बनाने की भारत की क्षमता आंकने के लिए तकनीकी और राजनीतिक पहलुओं पर सीआईए जानकारी जुटाता रहा.

आखिरकार अमरीकी ख़ुफिया उपग्रहों से भारत के परमाणु परीक्षण करने के कई प्रयासों के संकेत मिले. जिसके बाद वर्ष 1995 में अमरीका ने भारत पर दबाव बनाना शुरू किया और उसे लगा कि भारत पीछे भी हट गया है.

अमरीकी विश्लेषकों का मानना था कि तत्कालीन ‘हिन्दु राष्ट्रवादी’ भारतीय जनता पार्टी की सरकार देश की रक्षा के लिए परमाणु हथियार चाहती तो है लेकिन दरअसल कोई परीक्षण नहीं करेगी.

हालांकि ये आंकलन ग़लत निकला और दस्तावेज़ बताते हैं कि परीक्षण के बाद ख़ुफिया तंत्र ने एक बार फिर उसके स्तर और प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण करना शुरू कर दिया.

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