अमीरी बाँटने का सच

इमेज कॉपीरइट Eye Wire Inc
Image caption दुनिया में भर में दौलत बढ़ी है लेकिन गरीबों के पास नहीं

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक भाषण के दौरान 'ट्रिकल डाउन सिद्धांत' को चुनौती दे डाली है. ओबामा ने ट्रिकल डाउन सिद्धांत पर कहा है, "यह काम नहीं करता. इसने कभी काम नहीं किया."

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि ट्रिकल डाउन के सिद्धांत से अमीरों ने केवल अपने हित साधे हैं.

ट्रिकल डाउन के सिद्धांत के हिसाब से मुक्त बाज़ार की व्यवस्था में अगर कुछ लोग बहुत अधिक तरक्की करते हैं तो उसमें कोई गलत बात नहीं क्योंकि उनकी दौलत उनके खर्चों के माध्यम से रिस कर नीचे आएगी जिससे समाज के निचले तबकों को भी लाभ होगा.

भारत ने भी 1991 में अर्थव्यवस्था को इसी सिद्धांत के हिसाब से खोला था और नीतियों को ढालना शुरू किया था.

साल 1991 से अब तक के भारत ने दुनिया में अपने आर्थिक रुतबे में तो बढ़ोत्तरी की है. लेकिन यहाँ अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई भी बहुत तेज़ी से बढ़ी है. दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार ट्रिकल डाउन थ्योरी और भारत के आर्थिक मॉडल को ग़लत बताते हैं.

ट्रिकल डाउन थ्योरी पर ओबामा के बयान पर आप क्या कहते हैं ?

दुनिया के अमीर तरीन लोग अपने आपको सही साबित करने के लिए यह ट्रिकल डाउन का सिद्धांत देते हैं. इस सिद्धांत को मानने वाले लोगों ने कहा है कि अगर उन्नत क्षेत्र और अधिक उन्नत होंगे तो निचले क्षेत्रों से लोग आकर उसमें समाहित हो जाएगें और इस तरह से नीचे से ऊपर तक सबको लाभ पहुँचेगा.

इस सिद्धांत का कुछ लाभ होता हुआ भी लगा लेकिन इसकी वजह से लोगों की आमदनी में खाई बहुत ही ज़्यादा बढ़ गई. हर जगह ग़रीबी की पुरानी परिभाषा के हिसाब से तो ग़रीबी कम होती है. लेकिन ग़रीबी की नई परिभाषा के हिसाब से ग़रीबी कम नहीं होती.

यूँ तो ओईसीडी अमीर देशों का संगठन है और खुद भी एक मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था का समर्थक है. इसकी एक नई रिपोर्ट में उभरती अर्थव्यवस्थाओं का भी तुलनात्मक अध्यन किया गया है. इस नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के बड़े प्रदेशों में अर्थ व्यवस्था के सुधार के लाभ नहीं पहुंचे. क्या आप सहमत हैं?

हाँ बिल्कुल. पिछले 30 सालों से जब से रेगनिज़्म और थ्रैचरइज़्म आया है बाज़ार की वाह-वाही होने लगी है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सोवियत संघ गिर गया और चीन ने एक दम अपना रुख़ बदल लिया.

बाद में पता यह लगा कि साल 2004 में अमरीका में अमीर ग़रीब के बीच की खाई उससे ज़्यादा हो गई जितनी 1920 के दशक में होती थी.

यह ज़रूर हुआ कि स्टॉक मार्केट में उछाल आने से मध्यम वर्ग को लगा कि उसके दौलत में इज़ाफ़ा हुआ है. लेकिन यह इज़ाफ़ा कागज़ों में हुआ था. जब मार्केट गिरे तो काग़ज़ो की कमाई काग़ज़ों में रह गई.

पिछले 30 सालों में ट्रिकल डाउन के आर्थिक सिद्धांत प्रतिपादित किए जा रहे थे ख़ास तौर पर चीन और भारत में. यहां कहा गया कि विकास की दर हो, चाहे वो किसी भी क़ीमत पर हो, तभी ग़रीबी दूर होगी. इन दोनों देशों ने विकास की ऊँची दर की कीमत चुकाई पर्यावरण से, सस्ती मज़दूरी से. इन देशों ने वेतन को बाँध दिया ताकि पश्चिमी ताकतों के साथ होड़ कर सकें. इसी वजह से चीन और भारत में आर्थिक असमानता बहुत ही ज़्यादा बढ़ी है.

दरअसल बाज़ार इसी तरह से चलता है कि जिसके पास पैसा है केवल उसी की बात सुनी जाती है.

लेकिन भारत में प्रधानमंत्री सदा सम्यक विकास की बात करते हैं. और वो महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार योजना और क़र्ज़ माफ़ी के फ़ैसले गिनाते हैं?

दरअसल यह ग्रामीण रोज़गार योजना और क़र्ज़ माफ़ी योजना आपको इसलिए लानी पड़ी क्योंकि गाँवों तक आर्थिक उन्नति के लाभ नहीं पहुँचे. ये योजनाएँ सहारा थीं पर इलाज नहीं. गाँवों में ऐसे हालात इसलिए बने क्योंकि पिछले 20 साल में भारत का 80 फ़ीसदी पैसा संगठित क्षेत्र में जाता है जहाँ महज़ छह सात फ़ीसदी का रोज़गार मिलता है. असंगठित क्षेत्र जहाँ से 93 फ़ीसदी लोगों को रोज़गार मिलता है वहां केवल 20 फ़ीसदी पैसा लगाया गया.

खेती में जहाँ देश के 50 फ़ीसदी लोग काम करते हैं वहां केवल दो फ़ीसदी पैसा लगाया जा रहा है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं खेती से भाग रहे हैं.

इस सबसे साबित होता है कि सामान्य नीतियों से ज़्यादातर लोगों का भला नहीं हो रहा है. इस वजह से क़र्ज़ माफी और ग्रामीण रोज़गार जैसी योजनाएँ लानी पड़ रही हैं. यह योजनाएँ सफलता की नहीं विफलता की निशानी हैं.

संबंधित समाचार