कनाडा हुआ अंतरराष्ट्रीय 'क्योटो संधि' से अलग

पीटर केंट
Image caption पर्यावरण मंत्री का कहना है कि जलवायु परिवर्तन का मुद्दा क्योटो संधि के तहत हल नहीं हो सकता.

कनाडा के पर्यावरण मंत्री पीटर केंट ने जलवायु परिवर्तन पर तैयार क्योटो संधि से अलग होने की घोषणा की है.

पीटर केंट ने कहा कि कनाडा संधि से औपचारिक तौर पर अलग होने के फैसले से संयुक्त राष्ट्र को सूचित करेगा.

उन्होंने कहा कि संधि में ऐसा कुछ नहीं है जो कनाडा के लिए आगे का रास्ता हमवार करता हो और इसे लागू करने के लिए कनाडा को "अतिवादी और ग़ैर-ज़िम्मेदाराना फ़ैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ता."

कनाडा इस अंतरराष्ट्रीय संधि से अलग होने वाला पहला सदस्य देश होगा.

क्योटो संधि

जापान के क्योटो में 1997 में अपनाई गई ये संधि जलवायु परिवर्तन में बदलाव को रोकने के लिए तैयार की गई थी.

असल में 1992 में पर्यावरण के संबंध में एक समझौते के तहत कुछ मानदंड निर्धारित किए गए थे जिनके आधार पर 1997 में क्योटो संधि हुई.

फिर इस संधि के प्रावधानों में कुछ फेरबदल करने के बाद इसे 2002 में जर्मनी में जलवायु पर हुई वार्ता के दौरान अंतिम रूप दिया गया.

इस संधि के तहत औद्योगिक देश ग्रीन हाउस समूह की गैसों से होने वाले प्रदूषण को ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

इसके अनुसार इन देशों को इन गैसों, विशेष तौर पर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम करने के लिए लक्ष्य दिए गए थे.

इन गैसों को जलवायु के परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है.

पूरानी बात

पीटर केंट ने टोरोंटो में कहा, "क्योटो कनाडा के लिए गुज़री हुई बात है और इसलिए हम क्योटो संधि से अलग होने के अपने क़ानूनी अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं."

उन्होंने कहा कि क्योटो संधि के भीतर लगी शर्तों को लागू करने के लिए कनाडा को 13.6 अरब डॉलर की धनराषि ख़र्च करनी होती.

"इसके मुताबिक़ देश के प्रत्येक परिवार पर 1600 डॉलर का भार पड़ता. ये एक निकम्मी सरकार का फ़ैसला था."

कनाड़ा ने चार साल पहले घोषणा की थी कि वो क्योटो संधि के तहत किए गए वायदों को पूरा नहीं कर पाएगा.

उसका कहना था कि उसके सालाना उत्सर्जन में वर्ष 1990 से सिर्फ़ एक तिहाई का इज़ाफ़ा हुआ है.

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