'भारत में ज़मीन के लिए करोड़ों की घूस'

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Image caption ज़मीन मामलों में फैला भ्रष्टाचार देश की शासन प्रणाली पर भी असर डालता है.

भ्रष्टाचार संबंधी आंकड़े जारी करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल’ के मुताबिक भारत में हर साल लगभग 3,700 करोड़ रुपए ज़मीन संबंधी प्रशासनिक कामकाज के लिए घूस के तौर पर दिए जाते हैं.

ज़मीन संबंधी सरकारी कामकाज में कानूनी कार्रवाई, ज़मीन का पंजीकरण, मूल्यांकन-कर निर्धारण और ज़मीन वितरण जैसे कामकाज शामिल हैं.

‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल’ और फूड एंड एग्रीकल्चरल आर्गेनाइज़ेशन (एफ़ओए) की ओर से मिलकर किए गए इस अध्ययन के मुताबिक, ''ज़मीन संबंधी मामलों में राजनीतिक स्तर पर फैला भ्रष्टाचार देश के संसाधनों पर कब्ज़े के मकसद से किया जाता.''

इस अध्ययन में सामने आया है कि ज़मीन मामलों में फैला भ्रष्टाचार देश की शासन प्रणाली पर भी असर डालता है और समूची व्यवस्था को प्रभावित करता है.

रिश्वत का सहारा

साल 2009 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ओर से कराए गए इस सर्वेक्षण में 69 देश शामिल थे और यह सामने आया कि ज़मीन संबंधी मामलों से जुड़े हर दस में से कम से कम एक व्यक्ति को अपना काम कराने के लिए रिश्वत का सहारा लेना पड़ा.

‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल’ के मुताबिक इस मामले में बांग्लादेश की स्थिति सबसे ख़राब है जहां 71.2 फ़ीसदी लोग भ्रष्टाचार के शिकर हुए. साल 2007 में कराए गए सर्वेक्षण के बाद इन आंकड़ों में 20 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.

अध्ययन के मुताबिक आमतौर पर कानूनी तोड़-मरोड़ के ज़रिए ताकतवर और दबंद समूह असहाय, उपेक्षित वर्ग की ज़मीन पर जबरन कब्ज़ा कर लेता है. कई मामलों में यह सामने आया कि राज्य सरकार ने खुद बाज़ार से बेहद कम कीमत में बड़ी मात्रा में ज़मीन पर कब्ज़े किए.

अध्ययन के मुताबिक जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए जैविक-ईंधन के क्षेत्र में रुझान बढ़ा है और इसके चलते ज़मीन की ज़रूरतें बढ़ी हैं. यही वजह है कि जिन देशों में ज़मीन अधिग्रहण आसान है वहां भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं.

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