अरब जगत में परिवर्तनों का एक साल

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Image caption एक फल विक्रेता के आत्मदाह ने अरब जगत में जो मशाल जलाई वो इस समय भी धधक रही है.

ठीक एक साल पहले 17 दिसंबर के दिन ही ट्यूनीशिया में एक फल विक्रेता मोहम्मद बुअज़ीज़ी ने आत्मदाह किया था. एक अनजान फल विक्रेता ने इस क़दम ने उनके देश ट्यूनीशिया के अलावा सारे अरब जगत में एक क्रांति की शुरूआत की थी.

बुअज़ीज़ी के आत्मदाह के साल के भीतर तीन अरब देशों के राष्ट्राध्यक्ष सत्ता छोड़ चुके हैं और कुछ अब भी अपनी सत्ता बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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इस भूचाल से शायद ही कोई अरब देश बचा हो. पिछला साल अरब जगत में दशकों की यथास्थिति के बाद परिवर्तन की बयार लाया है.

ऐतिहासिक दिन

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Image caption राष्ट्रपति बेन अली भी बुअज़ीज़ी को अस्पताल में देखने पहूंचे लेकिन तब तक बाहर सड़कों पर उनके ख़िलाफ़ जन सैलाब उमड़ चुका था.

हर तरफ़ से निराश होने के बाद युवा ट्यूनीशियाई फल विक्रेता मोहम्मद बुअज़ीज़ी ने अपनी ज़िंदगी समाप्त करने का फ़ैसला किया.

अधिकारियों ने उसे अपने मुहल्ले में फलों की रेड़ी लगाने की अनुमति नहीं दी थी और वो इस बात से बेहद दुखी था.

सत्रह दिसंबर उसने ख़ुद को आग लगा ली, जिसके बाद उसके शहर में प्रदर्शन शुरू हो गए जो देखते ही देखते सारे ट्यूनीशिया में फैल गए. चार जनवरी को बुआज़ीज़ी की अस्पताल में मौत हो गई.

लेकिन ये मौत एक क्रांति को जन्म दे गई.

भ्रष्टाचार, राजनीतिक विरोध के दमन और अवसरों के अभाव से निराश ट्यूनीशिया के युवाओं ने प्रदर्शन कर शुरु किए. इन विरोध-प्रदर्शनों के दबाव में 23 साल से देश की सत्ता पर काबिज़ ज़ाइन अल-अबिदीन बेन अली को राज छोड़ना पड़ा.

उनके सत्ता छोड़ने का ऐलान देश के प्रधानमंत्री ने किया था. उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति अस्थाई रूप से अपने कर्तव्यों का निर्वाहन नहीं कर पा रहे हैं इसलिए अब उनकी ज़िम्मेदारियों को वो यानि प्रधानमंत्री स्वयं देखेंगे.

वीडियो: प्रदर्शनकारी बने टाइम मैगज़ीन के पर्सन ऑफ़ द ईयर

अरब स्प्रिंग के नाम से मशहूर हो चुकी इस क्रांति का बेन अली पहला शिकार तो थे लेकिन आख़िरी नहीं.

जल्द ही ट्यूनीशिया से उठी आग में अरब जगत का सबसे बड़ी आबादी वाला देश मिस्र झुलसने लगा.

परिवर्तन की प्यास

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Image caption तीन दशक तक राज करने के बाद होस्नी मुबारक पर अब मुकदमा चल रहा है.

लाखों लोग मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर जमाकर होकर राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के इस्तीफ़े की मांग करने लगे. मुबारक समर्थकों और सुरक्षाबलों की कोशिशों के बावजूद लोग तहरीर चौक पर डटे रहे.

आख़िरकार तीन दशक तक मिस्र पर राज करने के बाद 82 वर्षीय होस्नी मुबारक को पद छोड़ना पड़ा और देश की सत्ता सेना के हाथ में आ गई.

अब मुबारक पर एक मुकदमा चलाया जा रहा है, मिस्र चुनाव हो रहे हैं लेकिन प्रदर्शन अब भी जारी हैं.

उधर ट्यूनीशिया में नए सदन का गठन हो चुका है जो अब नया संविधान लिखेगा. इस सदन की सबसे बड़ी पार्टी एक आज़ाद ख़्याल इस्लामी गुट है. एन्नाहदा नाम के इस गुट ने वादा किया है कि वो देश में कठोर इस्लामी क़ानून नहीं लगाएंगे.

अहंकार का अंत

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Image caption गद्दाफ़ी का अंत उसके गृह शहर सिर्त में विद्रोहियों की गोली से हुआ

लेकिन ट्यूनीशिया के पड़ोसी देश लीबिया में ये क्रांति ख़ून से रंगी और ज़्यादा खिंचने जा रही थी.

ट्यूनीशिया और मिस्र के उदाहरणों से प्रेरित होकर लीबिया में सरकार विरोधियों ने देश के पूर्वी शहर बेनगाज़ी से प्रदर्शनों की शुरूआत की लेकिन ये साफ़ लग रहा था कि कर्नल गद्दाफ़ी सत्ता छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं हैं.

धीरे-धीरे प्रदर्शन सारे देश में फैलते गए. इसके बाद नेटो ने गद्दाफ़ी की सेनाओं पर हवाई हमले शुरू कर दिए. इन हमलों ने पासा पलट दिया और विद्रोहियों के हौसले बुलंद होने लगे. अक्तूबर में कर्नल गद्दाफ़ी को उनके गृह शहर में विद्रोहियों ने गोली मार दी.

रेडियो पर उनकी मौत की घोषणा कुछ इस तरह हुई, “हमें जानकारी मिली है कि अपराधी मारा गया है. उसके शव का पोस्ट मॉर्टम किया जाएगा और उसके बाद जो उसकी तस्वीरें देखना चाहेंगे, उन्हीं तस्वीरें दिखाई जाएंगी. ”

थमी नहीं है क्रांति

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Image caption सीरिया में राष्ट्रपति अल-असद के ख़िलाफ़ प्रदर्शन जारी हैं

लेकिन अरब क्रांति अभी थमी नहीं है. सीरिया में अब ख़ूनी संघर्ष जारी है. चार हज़ार मौतों के बाद भी वहां परिवर्तन की प्यास नहीं बुझी हैं.

प्रदर्शनों और संघर्ष के बीच सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद अब भी सत्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं.

उन्होंने हाल ही में कहा, “हम अपने लोगों को नहीं मारते...दुनिया की कोई सरका नहीं मारती..बशर्ते उसे कोई पागल चला रहा हो. मैं लोगों के समर्थन से राष्ट्रपति बना हूं. हमारे देश में किसी के लिए भी किसी को मारने का आदेश देना मुमकिन नहीं है.”

विद्रोह और सियासी विरोध के आवाज़ें अब भी सारे अरब जगत में प्रबल हैं.

और लोगों के विरोध को आवाज़ दे रहे हैं ट्यूनीशिया के रैप गायक हमादा बेन अमोर जिन्हें जनरल के नाम जाता है.

इनदिनों उनका सबसे लोकप्रिय गीत है - प्रेज़ीडेंट ऑफ़ द कंट्री यानि देश के राष्ट्रपति.

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