इतिहास के पन्नों में 29 दिसंबर

इतिहास के पन्ने पलटें तो 29 दिसंबर का दिन कई वजहों से याद किया जाएगा. इसी दिन भारत में कांग्रेस ने ऐतिहासिक बहुमत से संसदीय चुनाव में जीत दर्ज की और ब्रिटेन में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने वाला क़ानून लागू हुआ.

1984: राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की भारी बहुमत से जीत

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Image caption राजनीति में आने से पहले राजीव गांधी पायलट थे.

लोक सभा की 508 में से 401 सीटें अपने नाम कर, 29 दिसंबर 1984 को कांग्रेस ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे भारी बहुमत से संसदीय चुनाव जीता था. इस चुनाव में 28 सीटें जीतकर तेलुगु देसम सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरी.

उसी वर्ष 31 अक्तूबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षक ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. उसके बाद दो महीने तक उनके बेटे राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाला था.

माना जाता है कि राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के चुनाव जीतने में, उनकी मां के देहांत से जुड़ी सहानुभूति की बड़ी भूमिका थी. हालांकि कांग्रेस ने ये चुनाव देश से भ्रष्टाचार मिटाने के मुद्दे पर लड़ा था.

राजीव गांधी को 'मिस्टर क्लीन' भी कहा जाता था और उनकी अपनी छवि दाग़दार मानी जाती थी. चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद 40 वर्षीय राजीव गांधी भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने. हालांकि कांग्रेस वर्ष 1989 का अगला लोकसभा चुनाव हार गई थी.

1975: ब्रिटेन में महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकारों से जुड़ा क़ानून लागू

Image caption क़ानून के तहत रोज़मर्रा की भाषा में बदलाव लाया जाएगा.

29 दिसंबर 1975 को ब्रिटेन में एक ऐतिहासिक क़ानून लागू हुआ जिसके तहत समाज में और नौकरी की जगहों पर महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन और दर्जा दिया जाना अनिवार्य हो गया.

'द सेक्स डिस्क्रिमिनेशन एन्ड ईक्वल पे' क़ानून के प्रावधानों के मुताबिक एक ही नौकरी के लिए पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को कम वेतन देना ग़ैर-क़ानूनी हो गया.

पांच से ज़्यादा लोगों वाले संस्थानों में मालिक अगर लिंग के आधार पर पक्षपात करे या मकान-मालिक, कंपनियां, स्कूल, रेस्तरां आदि में भेदभाव हो तो वो ग़ैर-क़ानूनी माना जाने लगा.

इस क़ानून के तहत महिलाओं और पुरुषों में समानता बढ़ाने के लिए एक 'ईक्वल ऑपरच्यूनिटी कमिशन' बनाया गया. क़ानून के तहत नौकरियों के विज्ञापनों में लिंग की चर्चा को रोका गया और कोई भी पद केवल पुरुषों या महिलाओं के लिए चिन्हित ना किए जाने का प्रस्ताव रखा गया.

क़ानून के मुताबिक रोज़मर्रा की भाषा में भी बदलाव लाने की बात कही गई. उदाहरण के तौर पर 'फ़ायरमेन' की जगह 'फ़ायर फ़ाइटर्स' शब्द का इस्तेमाल किया जाए.

इस क़ानून के लागू होने के 25 वर्ष बाद किए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इसकी मदद से महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन के फ़र्क़ को 40 फ़ीसदी से घटाकर 20 फ़ीसदी किया जा सका है.

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