'अरबी बसंत' का भविष्य

अरब जगत
Image caption साल 2011 में अरब जगत में उठे विद्रोह के हाथ

‘अरबी बसंत’ के नाम से मशहूर हो चुके अरब जगत के लोकतंत्र हिमायती विद्रोहों ने पश्चिमी एशिया से लेकर उत्तरी अफ़्रीका तक एक मौलिक कायापलट का आग़ाज़ कर दिया है. सीरिया को छोड़कर इन विद्रोहों ने धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद पर आधारित तानाशाहियों के युग का अंत कर दिया है.

अपने चरम पर अरब राष्ट्रवाद उपविनेशवाद-विरोधी, समाजवादी, अबर एकता और लैंगिक समानता का चिन्ह था. ‘अरबी बसंत’ की शुरूआत में ही ये विचार अपने आख़िरी पड़ाव पर थे.

अमरीका की इराक़ पर चढ़ाई और सद्दाम हुसैन को सज़ा-ए-मौत ने अरब राष्ट्रवाद पर एक नैतिक प्रहार किया था.

पूर्व-औपनिवेशिक आधुनिकीकरण का खाका खींचने वाले गमाल अब्देल नासिर की मौत के बाद ही अरब राष्ट्रवाद अरब जगत की धड़कन यानि मिस्र में हार चुका था.

नए युग की शुरूआत

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Image caption प्रदर्शनों के बाद कई देशों में इस्लामी विचारधारा वाले दल प्रभावशाली हो गए हैं.

इस क्षेत्र में अरब समाजवाद की कब्र पर अरबी बसंत एक नई विचारधारा की नींव रख रहा है. लोकतंत्र को एक ज़रिया बनाते हुए अरबी बसंत ने एक नए युग की शुरूआत की है जिसमें राजनीतिक इस्लाम ने अपना मज़बूत दावा पेश किया है.

अरबी विद्रोह का केंद्र रहे ट्यूनीशिया में अल नाहदा नाम की इस्लामी पार्टी एक मज़बूत राजनीतिक ताक़त के तौर उभरी है. इस्लामी दल मोरक्को में भी जीते हैं. इसके अलावा लीबिया में भी इन दलों का दबदबा है.

इस समय मिस्र में चल रहे चुनावों में भी राजनीतिक पलड़ा निर्णायक तौर से इस्लामी दलों की ओर ही झुका हुआ है. मिस्र में ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ के राजनीतिक अंग ‘फ़्रीडम ऐंड जस्टिस पार्टी’ और कट्टरपंथी सलाफ़ी गठबंधन अल-नूर लोकतंत्र की राह में जीत की ओर अग्रसर हैं.

हालांकि अरबी बसंत के बाद राजनीतिक इस्लाम का उदभव काफ़ी हैरान करने वाला है लेकिन इसकी प्रक्रिया काफ़ी पहले शुरू हो चुकी थी. ये 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति से शुरु हुआ.

ईरान राजनीतिक इस्लाम के शिया ब्रांड का गढ़ बन गया, जिसका प्रभाव हिज़बुल्ला के ज़रिए लेबनान पहुंच गया.

इस्लामी दलों में प्रतिस्पर्धा

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Image caption अति कट्टरपंथी विचारधारा वाले सलाफ़ी दलों का दबदबा बढ़ा है.

साल 2003 में इराक़ पर अमरीकी हमले के बाद वहां के शिया नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए ईरान एक प्रभावी बाहरी तत्व बन गया. सीरिया के साथ-साथ ईरान ने भी फ़लस्तीन में हमास का ज़ोरदार समर्थन कर अपनी पहुंच इसराइल के दरवाज़े तक जता दी है.

आने वाले महीनों और सालों में मौलिक राजनीतिक संघर्ष इस्लामी दलों और आज़ाद ख़्याल दलों के बीच ना होकर सिर्फ़ इस्लामी दलों के बीच ही होगा.

मोटे तौर पर इस्लामी दलों के तीन रूप हैं - पहला सलाफ़ी विचारधारा से प्रभावित कट्टरपंथी इस्लामी गुट जिसे लीबिया में देखा जा सकता है, दूसरा नर्म-इस्लामी गुट जो तुर्की से प्रभावित है और तीसरा मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड जो विचारधारा के तौर पर पहले दोनों के बीच का मार्ग अपनाता है.

इन तीनों में अरब क्षेत्र की राजनीतिक ज़मीन के लिए संघर्ष होने की संभावना है.

तुर्की का मॉडल

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Image caption तुर्की के मॉडल को लेकर मुस्लिम ब्रदरहुड अधिक उत्साहित नहीं है. इस तस्वीर में तुर्की के प्रधानमंत्री लीबिया के नए प्रशासकों से मिलने के बाद प्रेसवार्ता में बोल रहे हैं.

लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षवाद और इस्लाम के मिश्रण वाला तथाकथित ‘तुर्की मॉडल’ ट्यूनीशिया में अल नाहदा पर गहरी छाप छोड़ रहा है. उसकी अगुवाई कर रहे हैं जाने-माने विचारक रचेद घनूची. रचेद घनूची नए युग के इस्लाम के हिमायती हैं जिसमें उनके हिसाब से मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों का लोकतांत्रिक ढांचा भी कारगर है.

हालांकि तुर्की और उसके नेता रेचेप तय्यिप इर्दोगान मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थक युवाओं में काफ़ी लोकप्रिय हस्ती हैं लेकिन आमतौर पर मुस्लिम ब्रदरहुड तुर्की के धर्मनिरपेक्ष सिंद्धातों से इत्तफ़ाक नहीं रखता.

लेकिन मिस्र में सेना, सलाफ़ियों और युवा शक्ति से भयभीत ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ निकट भविष्य में एक उदार इस्लामी रास्ता ही अपनाने वाला है.

पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ़्रीका के जिन देशों में भी उथल-पुथल हुई है, उनमें से लीबिया दुनिया की सुरक्षा को सबसे बड़ा ख़तरा पैदा कर सकता है.

त्रिपोली में पहले ही कई कट्टरपंथी इस्लामी नेता सत्ता में आ चुके हैं.

लीबिया में कट्टरपंथ

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Image caption लीबिया कट्टरपंथी इस्लाम के चंगुल में फंस सकता है

ये ऐसे देश में हो रहा है जहां एक वक़्त देरना जैसे क़स्बे से कई युवक अफ़गानिस्तान में अल-क़ायदा के प्रशिक्षण स्थलों पर जाते हैं.

लीबिया इस बात का ख़तरा बना हुआ है कि ये विशेषकर अपने पड़ोसी अफ़्रीकी देशों में आतंक के निर्यातक के रूप में उभरे.

राजनीतिक तौर पर अरब जगत में आए बदलाव से सऊदी अरबिया, ईरान और तुर्की जैसे दिग्गजों के बीच एक गंभीर क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा छिड़ने की संभावना है. सीरिया, यमन और बहरीन में इन ताक़तों के हित टकरा रहे हैं.

ऐसे समय में जब अरब जगत में देश अपने लिए स्वतंत्र राजनीतिक ज़मीन तलाश रहे हैं, वहां पश्चिम के हित प्रभावित हो सकते हैं. विशेषकर मिस्र जैसे बेहद प्रभावशाली देश में जहां पश्चिम-विरोधी और इसराइल-विरोधी विचार काफ़ी गहरे हैं.