ज़हरीली शराब के ख़िलाफ़ जंग में क्यों हुई हार

  • 4 जनवरी 2012
एक मृतक का परिवार
Image caption इस परिवार के एक सदस्य की ज़हरीली शराब पीने से मौत हो गई

आंध्रप्रदेश के कृष्णा ज़िले में मइलावरम तहसील स्थित पोरत्नानगर यूं तो बड़ा सुंदर, चारों ओर से जंगलों से घिरा, ग़रीबी और ख़ुशहाली के बीच कहीं खड़ा हुआ है लेकिन इस समय शोक के समंदर में डूबा हुआ है.

इस आदिवासी बस्ती और आसपास की दूसरी बस्तियों को ज़हरीली शराब के रूप में त्रासदी की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है.

नववर्ष से पहले यहां मौत का जो नाच शुरू हुआ था, उसमें अब तक 19 लोग अपनी जान गवां चुके हैं जिनमें से 12 लोग पोरत्नानगर के हैं.

हैदराबाद से 400 किलोमीटर दूर इस गांव में मेरी मुलाक़ात साठ वर्षीय बुज़ुर्ग महिला भीमुनी अजमेर से हुई जिसे इस त्रासदी में दोहरे शोक का बोझ उठाना पड़ा है. उसके पति के साथ-साथ दामाद की भी ज़हरीली शराब पीने से मौत हो गई जबकि परिवार के ही दो अन्य सदस्यों की जान मुश्किल से बची.

दुखों का पहाड़ टूटा

भीमुनी के दस बच्चों में से एक लड़की ने बताया, ''मेरी मां को आज तक किसी दुख का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन उस पर आज दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.''

भीमुनी अकेली नहीं हैं. उसके घर से कुछ ही दूरी पर रहने वाली कलेश्वरी भी अपने पति की मौत का शोक मना रही है. उसके दो छोटे बच्चे भी हैं जिनकी ज़िम्मेदारी अब अकेले उसी को उठाना है.

फ़िलहाल इन आदिवासी बस्तियों के चालीस से ज़्यादा लोग मइलावरम और विजयवाड़ा के अस्पतालों में भर्ती हैं. डॉक्टर भी नहीं बता पा रहे हैं कि ये लोग कब तक सामान्य हो पाएंगे.

इन्हीं लोगों में शामिल भांत बल्या अब तक समझ नहीं पाया है कि आख़िर हुआ क्या है क्योंकि वो इसी शराब को वर्षों से पी रहा था लेकिन उसे कभी कुछ नहीं हुआ था.

बल्या ने बताया कि बीते शनिवार की सुबह उसने शराब पी थी जिसके कुछ ही देर बाद उसे चक्कर आने लगे थे और जब वो गिर पड़ा तो दूसरे लोग उसे उठाकर अस्पताल ले गए.

उसने बताया कि हमेशा की तरह इस बार भी यह शराब पड़ोसी गांव कनिमेर्ला से आई थी.

प्रतिबंध के बावज़ूद ब्रिकी

हैरानी इसी बात की है कि जिस देसी शराब को बनाने, बेचने और पीने पर राज्य सरकार ने 18 वर्ष पहले प्रतिबंध लगा दिया था, वो इस इलाक़े में धड़ल्ले से कैसे बन और बिक रही थी.

सवाल भी उठता है कि इसे रोकने के लिए सरकार ने कुछ क्यों नहीं किया.

अजमेर भीमुदु और उस की पत्नी अजमेर लक्ष्मी का कहना है कि इस घटना का होना तय था क्योंकि उनकी बार-बार शिकायत करने के बावजूद सरकार ने इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया.

भीमुदु का कहना है, ''गांव के युवाओं और महिलाओं ने इसके ख़िलाफ़ आंदोलन भी चलाया जिसमें उन्हें कुछ सफलता भी मिली. लगभग तीन सप्ताह तक लोगों ने शराब नहीं पी, लेकिन शराब का कारोबार करने वालों ने फिर गड़बड़ी शुरू कर दी.''

शराब विरोधी अभियान चलाने वाली युवा समिति के एक सदस्य लाडिया रजा का कहना है कि शराब का व्यापार करने वाले अजमेर जमल्या, लक्षम्या और सूरी ने उस पर हमले करवाए. रजा के मुताबिक़, ''शराब के व्यापार में शामिल महिलाओं ने उसके ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला दर्ज कराने की धमकी दी जिसके बाद उन्होंने इस मुहिम से दूरी बना ली.''

एक अन्य महिला वी वी लक्ष्मी का कहना है कि पुलिस और आबकारी विभाग के लोग शराब के व्यापारियों से मिले हुए हैं. लक्ष्मी का कहना है कि पुलिस छापे की कार्रवाई करने से पहले इन व्यापारियों को आगाह कर देती है.

एक अन्य नागरिक भास्कर राव का कहना है कि इस इलाक़े के ग़रीब आदिवासी सस्ती शराब पीने पर मजबूर हैं. उन्होंने बताया कि इन लोगों की एक दिन की आमदनी सौ रूपए होती है और दस-बीस रूपए में उन्हें बहुत सारी देसी शराब मिल जाती है.

ख़तरा इस बात से ज़्यादा बढ़ गया है कि चोरी-छुपे शराब बनाने वालों ने नशा बढ़ाने के लिए शराब में ख़तरनाक रसायन मिलाना शुरू कर दिया है.

जानकारों का कहना है कि ये समस्या केवल मइलावरम के आदिवासी इलाक़े तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे राज्य में हर वर्ष लगभग 4000 करोड़ रूपए की अवैध देसी शराब बेची जाती है.

इससे हर साल कम से कम सौ लोग मरते हैं और पचास लोग अंधे हो जाते हैं. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय नेता कोटेश्वर राव कहते हैं कि सरकार तब ही जागती है जब ज़्यादा लोगों की मौत हो जाती है.

ठीक दो वर्ष पहले पूर्वी गोदावरी ज़िले में ऐसी ही एक घटना में 21 लोग मारे गए थे और उसके बाद वहां कार्रवाई भी की गई थी लेकिन पड़ोसी कृष्णा ज़िले में यह कारोबार चलता रहा.

आबकारी विभाग के अधिकारी यह कहकर अपने हाथ खड़े कर देते हैं कि उनके पास ज़रूरी अमला नहीं है जिसकी वजह से वो कार्रवाई नहीं कर सकते. विभाग में 2300 पद ख़ाली पड़े हैं जिन्हें भरने के लिए अब तक सरकार ने कोई क़दम नहीं उठाया है.

नेताओं की बयानबाज़ी

ज़हरीली शराब से हुई मौतों की ताज़ा घटना के बाद यह इलाक़ा नेताओं के बीच कुश्ती का अखाड़ा बन गया है. तमाम नेता इसके लिए सरकार की ग़लत नीतियों और कांग्रेसी नेताओं के भ्रष्टाचार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय नेता कोटेश्वर राव का आरोप है कि अवैध शराब का कारोबार करने वाले लोग तेलुगूदेशम पार्टी के हैं.

सरकार ने इस मामले में हर मृतक के परिवार को दो-दो लाख रूपए देने की घोषणा की है लेकिन आम नागरिक पूछ रहे हैं कि शराब पीने वालों ने कौन सा अच्छा काम किया था जो सरकार उन्हें पैसे दे रही है.

वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगनमोहन रेड्डी ने भी दुखी परिवारों से मुलाक़ात की है और उन्हें दिलासा दिया है.

दूसरे बड़े नेता भी इसी तरह तब तक आते और जाते रहेंगे जब तक कि यह मामला गर्म है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ज़हरीली शराब का यह अजगर कुछ दिन बाद फिर और लोगों को नहीं निगलेगा.

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