इतिहास के पन्नों में आठ जनवरी

  • 8 जनवरी 2012

अगर इतिहास के पन्नों को पलट कर देखेंगे तो आज के दिन यानि आठ जनवरी को ही फ्रांस में अल्जीरिया की स्वाधीनता के पक्ष में मतदान किया गया था और कंबोडिया से निरंकुश खमेर रूज को भागना पड़ा था.

1961: अल्जीरिया की स्वाधीनता के लिए जनमत संग्रह

Image caption अलजीरिया में मौजूद शासन के ख़िलाफ़ हाल में विरोध प्रदर्शन हुए.

अल्जीरिया की स्वाधीनता को लेकर फ्रांस में करवाए गए जनमत संग्रह में 75 प्रतिशत लोगों ने पक्ष में मतदान किया था. हालांकि अल्जीरिया में पक्ष में किए गए मतदान का प्रतिशत 69 था.

चालीस प्रतिशत से अधिक लोगों ने आज़ादी के पक्षधर विद्रोही गुट एफ़एलएन के कहने पर जनमत संग्रह का बहिष्कार किया था.

बेन बेला के नेतृत्व में एफ़एलएन ने फ्रांसीसी औपनिवेशकों के ख़िलाफ़ सालों से गुरिल्ला युद्ध छेड़ रखा था.

इसके कारण फ्रांस में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी.

फ्रासं में चार्ल्स डि गॉल की जीत इसी नाम पर हुई थी कि अल्जीरिया में जारी जंग को फ्रांस में फैलने से रोका जाएगा.

जनमत सर्वेक्षण के नतीजों की ख़बर सुनकर चार्ल्स डि गॉल ने टिपण्णी करते हुए कहा कि लोगों ने 'व्यावहारिकता का परिचय दिया है.'

जनमत के लिए किए गए मतदान के दौरान अल्जीरिया में भारी तनाव था. राजधानी अल्जियर्स में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए थे और वहां बीस हज़ार फ्रांसीसी सैनिक तैनात थे.

हालांकि किसी तरह की कोई बड़ी गड़बड़ी पेश नहीं आई लेकिन एफ़एलएन के एक मतदान केंद्र में किए गए हमले में कुछ लोगों की मौत हो गई थी.

लेकिन अधिकारियों का कहना था कि उन्हें बड़े पैमाने पर हिंसा की आशंका थी.

अल्जीरिया में फ्रांसीसी मूल के गोरे लोगों की बड़ी बसाहट है. तक़रीबन 10 लाख की आबादी वाले ये लोग वहां के 80 लाख की अल्जीरियाई मुस्लिम जनता पर हुकुमत कर रहे थे.

मुस्लिमों को बहुत ही कम राजनीतिक और वित्तीय अधिकार प्राप्त थे.

अलजीरिया 1962 में एक आज़ाद देश बन गया.

1979: कंबोडिया से खमेर रूज की वापसी

Image caption खमेर रूज के दौर में कंबोडिया में 17 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई थी.

वियतनामी विद्रोहियों के हाथों मात खाने के बाद खमेर रूज की सैकड़ों टुकड़ियां कंबोडिया से भाग खड़ी हुईं.

विद्रोहियों ने राजधानी नॉम पेन्ह पर क़ब्ज़ा कर लिया और पॉल पॉट के सैनिकों को देहाती क्षेत्रों में जाकर शरण लेनी पड़ी थी.

हारे हुए सिपाही पड़ोसी थाईलैंड में जा घुसे जहां उन्हें अवैध रूप से प्रवेश के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया.

थाईलैंड के अधिकारियों ने कहा कि उन्हें जबरन कंबोडिया वापस नहीं भेजा जाएगा.

ये खमेर रूज के लिए बहुत बड़ा झटका था. उन्होंने चार साल पहले ख़ुद ही नॉम पेन्ह पर क़ब्ज़ा किया था और विरोध के लिए उठने वाली हर आवाज़ को बुरी तरह से कुचल दिया था.

कहा जा रहा है कि जब खमेर रूज को लगा कि वो बेहतर हथियारों से लैस विद्रोहियों का सामना नहीं कर सकेंगे तो उन्होंने वहां से हटने में ही अपनी भलाई समझी.

कंबोडिया और वियतनाम के बीच चार सालों से सीमा को लेकर युद्ध जारी था. वियतनाम ने कंबोडिया पर हमले की शुरूआत क्रिसमस के दिन की थी. जिसमें उसे कंबोडिया में मौजूद वियतनाम से सहानभूति रखने वाले विद्रोहियों से मदद हासिल हुई.

इस मामले में रूस वियतनाम के साथ था जबकि चीन ने कंबोडिया को समर्थन दिया था.

साल 1975 में कंबोडिया पर हुई अमरीकी बमबारी के बाद खमेर रूज को वहां काफ़ी लोकप्रियता मिली थी. लेकिन बाद में उसने लोगों पर जुल्मों की इंतिहा कर दी.

खमेर रूज के क़ब्ज़े के दौरान कंबोडिया में 17 लाख लोगों की मौत हो गई थी.

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