नीदरलैंड भी पीक से परेशान

  • 12 जनवरी 2012
‘खाट' की पत्तियां इमेज कॉपीरइट AP
Image caption ‘खाट’ चबाकर इस्तेमाल किए जाने वाला नशीला पदार्थ है, जिसकी पत्तियों से निकलने वाला रस मादक होता है.

अगर आपको लगता है कि पान और गुटखे की पीक सिर्फ़ भारत के लिए एक समस्या है तो ऐसा नहीं है. नीदरलैंड ने पान की ही तरह के एक खाद्य पदार्थ ‘‘खाट’’ से सार्वजनिक जगहों पर हो रही गंदगी और परेशानी से निपटने के लिए इस पर प्रतिबंध लगाना पड़ा है.

‘‘खाट’’ हरी पत्तियों के रुप में पाया जाने वाला एक हल्का नशीला पदार्थ है, जिसे चबाने पर पत्तियों से निकलने वाला रस मादक होता है.

बीबीसी संवाददाता ऐना होलिगन के मुताबिक नीदरलैंड में पारंपरिक रुप से मादक पदार्थों के इस्तेमाल पर कोई खास रोकटोक नहीं लेकिन ‘खाट’ की पीक से होने वाली गंदगी, इसे खाने के बाद हल्के सुरूर के चलते हुड़दंग करते लोगों और इसके चिकित्सीय नुकसान को देखते हुए सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है.

चिकित्सकों के मुताबिक लंबे समय तक ‘खाट’ का उपयोग व्यक्ति में मानसिक विकार और पागलपन के लक्षण पैदा कर सकता है.

नीदरलैंड के मूल निवासियों के बजाय बड़ी संख्या में सोमालिया, इथियोपिया, कीनिया और यमन से आए लोग ‘‘खाट’’ के शौकीन हैं. ये लोग नीदरलैंड की मेहनतकश जनसंख्या का हिस्सा हैं और आमतौर पर दिहाड़ी मज़दूर, टैक्सी ड्राइवर या खेतों में काम करने वाले श्रमिक हैं.

‘कृपया यहां न थूकें’

‘खाट’ के शौकीन दिन के ज़्यादातर समय इसे चबाते हैं. कुछ उसी तरह जिस तरह भारत में लोग खैनी यानी तंबाकू, पान मसालों और पान के शौकीन हैं.

नीदरलैंड सरकार की ओर से लगाए गए इस प्रतिबंध के बाद अब ‘खाट’ को खरीदने और इसके सेवन के लिए लोगों को आसपास के उन देशों में जाना होगा जहां यह पदार्थ कानूनी रुप से खरीदा जा सकता है.

सरकारी अनुमान के मुताबिक नीदरलैंड में पिछले साल एक करोड़ आठ लाख डॉलर का ‘खाट’ लाया गया.

नीदरलैंड में आयात किए जाने वाले ‘खाट’ को इसके बाद बढ़ी कीमतों के साथ यूरोपीय देशों तक पहुंचाया जाता है.

भारत में भी ‘खाट’ की तरह पान, खैनी और गुटखे जैसे मादक पदार्थों से निकलने वाली पीक सरकारी दफ़्तरों, सड़कों और शौचालयों के आसपास गंदगी की जड़ है.

सड़कों और दीवारों पर लगी ‘कृपया यहां न थूकें’ की विनम्र तख्तियां भी जब लोगों को रोकने में कारगर नहीं होतीं तब अक्सर दीवारों और कोनों पर भगवान की छवियों का सहारा लिया जाता है.

दिल्ली की मेट्रो रेल में तो थूकने से रोकने के लिए दो सौ रुपए का अर्थदंड भी वसूलना शुरु किया गया है.

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