विभिन्न संस्थानों के बीच वर्चस्व की लड़ाई

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Image caption प्रधानमंत्री गिलानी और सेना प्रमुख अशफाक़ कयानी के संबंध पिछले कुछ दिनों में काफी बिगड़ गए हैं.

एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान इन दिनों काफ़ी नाज़ुक़ दौर से गुज़र रहा है. देश के सभी मुख्य संस्थान और प्रमुख पदासीन लोग एक अघोषित निर्णायक लड़ाई की तैयारी में लगे हैं.

पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की फ़ौज वहाँ की नागरिक सरकार पर लगातार दबाव बढ़ाती जा रही है. इसी के तहत वे सुप्रीम कोर्ट की एक जाँच में भी शरीक़ हुए जिसके नतीजे में राष्ट्रपति ज़रदारी को एक 'ग़द्दार' तक ठहराया जा सकता है.

सरकार ने फ़ौज के इस क़दम की निंदा करते हुए इसे लोकतंत्र विरोधी बताया है और फ़ौज को चेतावनी दी है कि वो देश के भीतर 'एक दूसरा तंत्र' स्थापित करने की कोशिश ना करे.

सुप्रीम कोर्ट फ़ौज के साथ हो गई दिखती है जहाँ उसने प्रधानंमत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी की ईमानदारी पर सवाल उठाए.

वहीं प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने अदालत के कुछ फ़ैसलों को ये कहकर मानने से इंकार कर दिया है कि वे राजनीति से प्रेरित फै़सले थे.

सत्ता पर अधिकार हासिल करने के लिए की जा रही ये लड़ाई पाकिस्तान के भीतर तब हो रही है जब कई विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ 2013 में होने वाले चुनावों के लिए बढ़त लेने की कोशिश में हैं. वैसे ये चुनाव निर्धारित समय से पहले भी हो सकते हैं.

पिछले 15 सालों से राजनीति में एक छाप छोड़ने की विफल कोशिश कर चुके पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान की रैलियों में भी अचानक लाखों की संख्या में लोग जुटने लगे हैं, इमरान ने इसे सूनामी की संज्ञा देते हुए देश से 'भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का अंत' करने का ऐलान किया है.

पिछले चार साल से देश से बाहर रह रहे पूर्व सैनिक शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने जनवरी महीने के अंत तक देश लौटने की घोषणा की है हालाँकि उनके ख़िलाफ़ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

युद्ध की अर्थव्यस्था

इस पूरे घटनाक्रम के बीच ऐसा लगता है मानो पाकिस्तान एक बहुत बड़ी अव्यवस्था की ओर बढ़ता जा रहा है जिसका अंत या तो बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के रूप में होगा या जो पूरे तंत्र को ही नष्ट कर देगा.

वैसे तो पाकिस्तान को मज़बूत लोकतंत्र विरासत में मिला था लेकिन बार-बार सेना के तख़्तापलट और कमज़ोर न्यायपालिका ने ना सिर्फ यहाँ की लोकतांत्रिक सरकार को कमज़ोर किया है बल्कि नेताओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.

एक के बाद एक आए सैनिक शासन और फिर परोक्ष रूप से फ़ौज के हाथ की कठपुतली सरकारों के चलते देश में बंदूक की संस्कृति को बढ़ावा मिला और समाज पर सेना का प्रभाव भी बढ़ा. कई जानकार इन हालात को 'युद्धनीति से बनी अर्थव्यवस्था' की संज्ञा देते हैं.

जानकारों के मुताबिक़ देश में तख़्तापलट के इतिहास के बावजूद देश में एक और तख़्तापलट इस समय होने की आशंका नहीं ही है.

पर कई अन्य लोग ये मानते हैं कि फ़िलहाल सेना सुप्रीम कोर्ट को उसका काम करने देना चाहती है जिससे किसी 'संवैधानिक' तरीक़े से ही सरकार को परेशान किया जा सके.

पाकिस्तान की मौजूदा सरकार उसके इतिहास में टिकने वाली सबसे लंबी लोकतांत्रिक सरकार है और शायद यही वो वजह है कि सेना और सरकार की बीच विवाद की स्थिति इस क़दर बिगड़ चुकी है.

मौजूदा सरकार ने 2008 में सत्ता पाने के बाद सेना और आईएसआई को नागरिक प्रशासन के दायरे में लाने की विफल कोशिश भी की थी.

दोनों संस्थाओं के बीच विवाद दोबारा तब शुरू हुआ जब पिछले साल मई महीने में पाकिस्तान के ऐबटाबाद शहर में अल क़ायदा नेता ओसामा बिन लादेन मारे गए. तब कई राजनैतिक दलों ने ओसामा को ना ढूँढ़ पाने के लिए फ़ौज को दोषी ठहराया था.

इसके बाद हालात तब और बिगड़े गए जब 'मेमोगेट स्कैंडल' हुआ जिसमें, पाकिस्तान सरकार ने अमरीका से पाकिस्तान में किसी भी तरह के सैन्य तख़्तापलट से निपटने के लिए मदद माँगी थी.

हालांकि सरकार ने सफ़ाई देते हुए कहा था कि उस मेमो पर किसी के हस्ताक्षर नहीं थे और इसमें राष्ट्रपति ज़रदारी का कोई हाथ नहीं था.

अस्पष्ट भविष्य

पाकिस्तान के मौजूदा हालात का कारण सरकार और सेना के बीच मेमोगेट मुद्दे पर हुई असहमति है.

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Image caption प्रधानमंत्री गिलानी ने तख़्तापलट के अंदेशे को देखते हुए सेना को चेतावनी दी है

इस तरह की स्थिति पाकिस्तान में पहले कभी नहीं आई थी और जिस तरह से अब इस लड़ाई में नए लोग कूद रहे हैं उससे भविष्य का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.

अगर सरकार सुप्रीम कोर्ट की हिदायतें मानने से आगे भी इंकार कर देती है तो क्या सुप्रीम कोर्ट अपने आदेशों को लागू करवाने के लिए सेना को बुला सकता है, जिसका उसे संविधान के तहत अधिकार भी है.

और अगर फ़ौज सीधे तौर पर इस लड़ाई में शामिल हो जाती है तो क्या वो एक और तख़्तापलट को अंजाम देगी?

सरकार के पास दो ही रास्ते हैं. अगर वो न्यायपालिका और फ़ौज के सामने खड़ी रहते हुए बर्ख़ास्त हो जाती है तो अपने ऊपर अब तक लगे आर्थिक गड़बड़ी, ख़राब शासन और भ्रष्टाचार के आरोपों से बच सकती है.

लेकिन अगर वो इस संकट से सफलतापूर्वक बाहर निकल जाती है तो ये पाकिस्तान में लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं की अब तक की सबसे बड़ी जीत होगी.

वैसे जानकारों की मानें तो मार्च 2012 में प्रस्तावित सीनेट चुनाव से पहले सरकार को गिराने की कोशिश होगी क्योंकि उसके बाद ऊपरी सदन में ज़रदारी को बहुमत मिलने की संभावना है.

लेकिन तब तक हमें इंतज़ार करके देखते रहना होगा कि विभिन्न संस्थान और संसद के विभिन्न गुट आने वाले दिनों और हफ़्तों में अपने पत्ते कैसे चलते हैं.

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