पैगंबर मोहम्मद के कार्टून पर ब्रिटेन में विवाद

यूसीएल की अथीस्ट सोसाइटी का फ़ेसबुक पेज इमेज कॉपीरइट Facebook
Image caption अब संस्था ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बरक़रार रखने के लिए एक पेटीशन शुरू की है

पैगंबर मोहम्मद के एक चित्र को लेकर ब्रिटेन के सबसे जाने-माने विश्वविद्यालयों में से एक यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में विवाद हो गया है.

विश्वविद्यालय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता की बहस में फँस गया है.

विश्वविद्यालय की 'अथीस्ट सोसाइटी' यानी नास्तिकों की संस्था नाम से चलने वाली इस संस्था ने फ़ेसबुक पर अपने पेज पर एक कार्टून लगाया है जिसमें पैगंबर मोहम्मद को एक बार में ईसा मसीह के साथ बैठे हुए दिखाया गया है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन या यूसीएल में छात्रों के बीच ये विवाद एक विडंबना ही है क्योंकि ये विश्वविद्यालय ब्रिटेन का पहला धर्मनिरपेक्ष विश्वविद्यालय था.

इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1826 में चर्च के घोर विरोध के बीच हुई थी.

अब नास्तिक और मानवतावादी छात्रों का एक गुट धार्मिक विशेषाधिकारों को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है और उनकी इस कोशिश के आड़े आ गया है छात्रों के कल्याण पर नज़र रखने वाला छात्र संघ.

छात्रों के उस गुट से कहा गया है कि फ़ेसबुक पर उसने पैगंबर मोहम्मद और ईसा मसीह का जो कार्टून लगाया है वो हटा ले.

हटाने की सलाह

Image caption यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के छात्रसंघ ने संस्था से तस्वीर हटाने की अपील की है

उस कार्टून में पैगंबर मोहम्मद और ईसा मसीह को एक बार में बैठे दिखाया गया है और उनके सामने गिलास रखा है जिसमें शायद शराब है.

इस्लाम में शराब निषेध है मगर इस कार्टून में उससे भी बड़ा अपराध ख़ुद पैगंबर मोहम्मद का चित्र बना देना है.

छात्र संघ का कहना है कि उसने इस गुट को सिर्फ़ वो कार्टून हटा लेने की सलाह दी है.

मगर छात्र संघ ये नहीं बता रहा है कि क्या उस कार्टून पर ईसाइयों या मुसलमानों ने कोई शिकायत की है.

छात्र संघ ने बीबीसी को बताया है कि उनकी ज़िम्मेदारियों में से एक छात्रों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना भी है और वे वही निभा रहे हैं.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धार्मिक मामलों में कहाँ तक जा सकती है ये बहस थमने का नाम नहीं लेती. उसमें भी ख़ास तौर पर यूरोप में ये बहस कुछ अंतराल के बाद सामने आ ही जाती है.

वहाँ कलाकार और लेखक वैसे भी अपेक्षाकृत उदारवादी और खुली परंपरा से आते हैं और वे इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं.

सभी ने तो नहीं मगर कई प्रकाशनों ने पैगंबर मोहम्मद के चित्र छापने पर प्रतिबंध लगा रखा है.

पिछले साल व्यंग्य पत्रिका चार्ली हेब्दो के पेरिस कार्यालय पर हमला किया गया था क्योंकि उसने अपने कवर पेज पर मोहम्मद साहब की तस्वीर छाप दी थी.

इसके अलावा 2006 में जब डेनमार्क के एक अख़बार ने पैगंबर साहब की तस्वीरें छाप दी थीं तो उसके बाद दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे और एशिया तथा मध्य पूर्व में तो कई मौतें भी हो गई थीं.

इस विवाद के केंद्र में मौजूद छात्रों ने अब एक याचिका शुरू की है जिसमें उनका कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी के ठेस न पहुँचाए जाने के अधिकार से बड़ा है.

विश्वविद्यालय की प्रशासकीय संस्था का कहना है कि छात्र संघ के लोग इस बारे में चर्चा जारी रखे हैं.

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