बर्मा: विद्रोहियों के साथ संघर्ष-विराम समझौता

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Image caption करेन नेश्नल यूनियन के सदस्यों के साथ सरकार के अधिकारी बुधवार से बातचीत कर रहे थे.

बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक बर्मा की सरकार ने करेन विद्रोहियों के साथ संघर्ष-विराम के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.

एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक, दोनों पक्षों में हुए समझौते के तहत करेन विद्रोही अपना जनसंपर्क दफ़्तर खोल सकेंगे. साथ ही एक दूसरे के क्षेत्र में आवाजाही शुरू करने पर भी सहमति हुई है.

बर्मा में नस्ली अल्पसंख्यक करेन, पिछले 60 वर्षों से भी ज़्यादा समय से स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

वर्ष 1989 के बाद से अब तक बर्मा की सरकार 17 विद्रोही गुटों के साथ संघर्ष-विराम की बातचीत की शुरुआत कर चुकी है.

पिछले वर्ष 'शैन एंड करेन' और 'शैन स्टेट आर्मी साउथ' नाम के गुटों के साथ संघर्ष-विराम का समझौता किया गया था.

पहला चरण

बर्मा के पूर्वी करेन राज्य की राजधानी हपा-आन में अधिकारियों और करेन नेश्नल यूनियन (केएनयू) के बीच चल रही वार्ता के बाद ये समझौता हुआ है.

एक केएनयू नेता, डेविड हतौ ने 63 वर्षों में हुए इस पहले लिखित समझौते का स्वागत करते हुए कहा, ''बातचीत से ही कुछ हासिल होता है लेकिन ज़्यादा महत्व ज़मीन पर किए गए काम का होगा.''

बीबीसी की दक्षिण-पूर्वी एशिया संवाददाता रेचल हार्वी के मुताबिक संघर्ष-विराम शान्ति की ओर पहला क़दम भर है, लेकिन ये सूचक भी है कि दशकों पुरानी लड़ाई ख़त्म करने के लिए दोनों पक्षों संकल्परत रहे हैं.

सरकार की ओर से शांति वार्ता का नेतृत्व रेल मंत्री ऑंग मिन ने किया. उन्होंने बीबीसी को बताया कि डेढ़ महीने बाद दोनों पक्षों के बीच फिर मुलाकात होगी और कुछ ठोस कदमों पर बातचीत होगी.

ऑंग मिन ने कहा, “ये पहला चरण है, अगले चरण में राष्ट्रीय स्तर पर बात होगी.”

प्रतिबंध हटाने की शर्त

नवंबर 2010 में 20 वर्षों में पहली बार बर्मा में हुए चुनाव के बाद सत्ता में आई सैन्य समर्थन वाली सरकार की ओर से इन समझौतों की कोशिश किए जाने के पीछे एक बड़ी वजह है.

दरअसल नस्ली अल्पसंख्यकों के साथ संघर्ष-विराम, पश्चिमी सरकारों की ओर से बर्मा पर लगे प्रतिबंध हटाने की दिशा में एक प्रमुख मांग है.

वर्ष 1948 में ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद बर्मा में सामाजिक असंतोष पनपता रहा है. संघर्ष की वजह से हज़ारों नस्ली अल्पसंख्यक विस्थापित हुए हैं और कई को सीमापार थाईलैंड भागना पड़ा है. अभी भी लाखों शरणार्थी थाईलैंड के राहत शिविरों में रह रहे हैं.

जानकारों के मुताबिक बर्मा की सरकार और नस्ली अल्पसंख्यकों के बीच लंबी अवधि का शांति समझौता होने में अभी समय लगेगा.

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