इतिहास के पन्नों में 13 जनवरी

  • 13 जनवरी 2012

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो पता चलता है कि 13 जनवरी के दिन कई महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटी थीं.

1964: कोलकाता में सांप्रदायिक दंगे

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Image caption कोलकाता में आज़ादी से पहले 1946 में भी भयानक दंगे हुए थे जिनमें लगभग दो हज़ार लोग मारे गए थे.

आज ही के दिन 1964 में भारत के पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हिंदू और मुसलमानों के बीच भयानक सांप्रदायिक दंगे हुए थे जिनमें कम से कम 100 लोग मारे गए थे और 400 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे.

दंगों की चपेट में कोलकाता के अलावा आस-पास के ज़िले भी आ गए थे.

पुलिस ने लगभग सात हज़ार लोगों को हिरासत में लिया था लेकिन फिर भी दंगों पर क़ाबू पाने में सफलता नहीं मिल रही थी.

शहर के पांच थाना क्षेत्रों में मुसलमानों के घरों को आग लगाने और लूट-पाट की घटना के बाद प्रशासन ने वहाँ 24 घंटे का कर्फ़्यू लगाने का फ़ैसला किया था.

पुलिस और सैन्य बलों को बलवाइयों और उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए गए थे.

छुरेबाज़ी और बम फेंकने की कई घटनाएं हुईं थी लेकिन दंगों में ज़्यादातर मुसलमानों की संपत्ति को नुक़सान पहुंचा था.

लगभग 70 हज़ार मुसलमान अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो गए थे और लगभग 55 हज़ार लोग सेना की सुरक्षा में शिविरों में सो रहे थे.

जनवरी 1964 में भारत-प्रशासित कश्मीर की राजधानी श्रीनगर की एक मस्जिद से इस्लाम धर्म के संस्थापक पैग़ंबर मोहम्म्द से जुड़ी एक ख़ास चीज़ के ग़ायब होने की ख़बर के बाद दंगे भड़के थे.

इसकी प्रतिक्रिया में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश में दंगे भड़के जिनमें 29 हिंदू मारे गए थे.

उसका बदला लेने के लिए बंगाल के गाँवों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हमले होने लगे और बाद में कोलकाता भी इसकी चपेट में आ गया.

जनवरी के आख़िर तक दंगों पर क़ाबू पा लिया गया था लेकिन उसी साल मार्च में फिर दंगे भड़के थे जिनमें 21 मुसलमान मारे गए थे.

1993: दक्षिणी इराक़ पर अमरीकी हमला

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Image caption इराक़ पर हमला के लिए उड़ान भरता हुआ अमरीकी विमान

अमरीका और उसके सहयोगियों ने दक्षिणी इराक़ में नो फ़्लाई ज़ोन लागू करने के लिए 1993 में आज ही के दिन इराक़ पर हवाई हमले की शुरूआत की थी.

अमरीका का आरोप था कि इराक़ पहले खाड़ी युद्ध(1991) के बाद संयुक्त राष्ट्र के ज़रिए तय किए गए नो फ़्लाई ज़ोन का उल्लंघन कर रहा था.

अमरीका के साथ ब्रिटेन और फ़्रांस के विमानों ने भी इस हमले में हिस्सा लिया था.

गठबंधन सेना के अनुसार वे अपने मिशन में सफल हुए थे.

व्हाइट हाउस के प्रवक्ता मार्लिन फ़िट्ज़वाटर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, इराक़ की सरकार को ये बात समझ लेनी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के क़रारदादों के उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

उसी साल जून में अमरीकी सेना ने एक बार फिर इराक़ पर हमला किया था.

मार्च 2003 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ये कहते हुए एक दफ़ा फिर इराक़ पर हमला किया कि इराक़ के पास महाविनाश के हथियार हैं.

अमरीकी सेना ने इराक़ पर क़ब्ज़ा भी कर लिया लेकिन इराक़ के पास ऐसा कोई हथियार नहीं पाया गया.

इराक़ के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को गिरफ़्तार किया गया था और 2006 में उन्हें फांसी दे दी गई थी.

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