छत्तीसगढ़: नए ज़िलों की ज़ोर पकड़ती राजनीति

छत्तीसगढ़ का एक नया ज़िला
Image caption छत्तीसगढ़ में और ज़िले बनाने की मांग बढ़ती जा रही है.

मध्य प्रदेश से पृथक होकर बने नए राज्य छत्तीसगढ़ में पिछले लगभग दस सालों में ही ज़िलों की संख्या 16 से बढ़ते-बढ़ते 27 पहुंच गई है लेकिन नए ज़िले बनाए जाने की मांग है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही.

इस खेप में जिन नौ नए प्रशासनिक खंडों की घोषणा पिछले साल की गई थी उनकी स्थापना का सिलसिला शुरू हो गया है.

वैसे तो इन नौ ज़िलों को पहली जनवरी से ही अस्तित्व में आना था, मगर आधारभूत ढांचे के अभाव की वजह से अब नए ज़िलों की स्थापना का काम एक-एक कर किया जा रहा है.

केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के काल में मध्य प्रदेश से अलग कर जब नवंबर 2000 में नए राज्य का निर्माण किया गया था तब ज़िलों की संख्या मात्र सोलह हुआ करती थी.

बस्तर

अविभाजित मध्य प्रदेश में बस्तर भारत का सबसे बड़ा ज़िला हुआ करता था. बाद में इसे पांच टुकड़ों में बांट दिया गया और पांच नए ज़िले बनाए गए.

शासन का तर्क है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि घने जंगलों वाला आदिवासी बाहूल्य ये इलाक़ा काफ़ी पिछड़ा हुआ था और नए ज़िलों की स्थापना से लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए दूर-दराज़ का सफ़र नहीं करना पड़ेगा.

साथ ही प्रशासन को भी काम काज देखने और विकास कार्यों के कार्यान्वयन में आसानी होगी.

अब दो नए ज़िलों के बनने की घोषणा से बस्तर संभाग में ही ज़िलों की कुल संख्या सात हो गई है.

नक्सली हिंसा

नक्सली गतिविधियों के मामले में दंतेवाड़ा के सुकमा का इलाक़ा भारत के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक माना जाता रहा है. यहां नक्सली हिंसा की बड़ी वारदातें अंज़ाम दी गई हैं.

चाहे वह वर्ष 2010 की अप्रैल माह में चिंतलनार में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ के 75 जवानों की नक्सली हमले में मौत हो या फिर दूसरी अन्य घटनाएं, दंतेवाड़ा में घटने वाली ज़्यादातर वारदातें सुकमा अनुमंडल में ही हुई हैं.

नक्सलियों का दावा है कि इस अनुमंडल का एक बड़ा उनके अधीन है जहाँ उनकी 'जनताना सरकार' चलती है. बहुत सारे इलाक़े दुर्गम है, या यूं कहा जाए कि इन इलाक़ों में पहुंचना बहुत मुश्किल है.

सोलह जनवरी यानी सोमवार से सुकमा अलग ज़िले के रूप में काम करने लगेगा.

सुकमा के अलावा बस्तर का ही कोंडागांव दूसरा ऐसा संवेदनशील इलाक़ा है जो सुरक्षा बलों और माओवादी छापामारों के बीच चल रही हिंसा के केंद्र में है.

Image caption छत्तीसगढ़ में हाल के वर्षों में नक्सली हिंसा बढ़ी है.

कोंडागांव को भी अलग ज़िले का दर्ज़ा दिया गया है.

विकास

छत्तीसगढ़ सरकार में पंचायती राज और ग्रामीण विकास मंत्री रामविचार नेताम का कहना है कि नए ज़िलों की स्थापना विकास के दृष्टिकोण से ही की गयी है.

बीबीसी से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसी बहुत सारी योजनाएं हैं जिनके क्रियान्वयन पर नज़र रखना ज़रूरी है. उन्होंने कहा, ''छोटा ज़िला बनता है तो ये काम आसान हो जाएगा. वहां विकास बेहतर ढंग से किया जा सकता है.''

सुकमा और कोंडागांव के अलावा जिन इलाक़ों को ज़िलों का दर्ज़ा दिया गया है, उनमें बालौद, गरियाबंद, मुंगेली, बेमेतरा, सूरजपुर, बलौदाबाज़ार और बलरामपुर शामिल हैं.

बस्तर संभाग में नक्सल विरोधी अभियान का नेतृत्व कर रहे सीआरपीएफ़ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह का भी मानना है कि छोटे ज़िलों से नक्सल विरोधी अभियान को भी बल मिलेगा.

सुरजीत कहते हैं कि बस्तर ज़िले से अलग कर कोंडागांव को नया ज़िला बनाने से अभियान काफी केंद्रित रहेगा.

वे कहते हैं, ''केशकाल से लेकर गीदम तक कम से कम दस थाने ऐसे हैं जो बहुत संवेदनशील हैं. ये इलाक़े हमेशा नक्सलियों के निशाने पर रहते हैं. अब कोंडागांव के लिए एक अलग एसपी तैनात किए गए हैं. पुलिस के दृष्टिकोण से ये एक अच्छा क़दम है."

राजनीति

नया ज़िला बनने से सुकमा इलाके के लोग भी काफी उत्साहित हैं. वे कहते हैं कि पिछले कई सालों से उनके इलाके में विकास की रौशनी नहीं पहुँच पाई है. जर्जर भवन, टूटी सड़कें और योजनाओं का अभाव कुछ ऐसे कड़वे सच हैं जिनके साथ इस इलाक़े के लोगों को जीना पड़ रहा है.

दोरनापाल के नगर पंचायत भवन में भी नए ज़िले को लेकर उत्साह का माहौल है. दोरनापाल के ही लक्ष्मीनारायण राव और दुलाल सहा कहते हैं कि जैसे छोटे राज्य ज़रूरी हैं, उसी तरह छोटे ज़िलों के बनने से लोगों को राहत मिलेगी.

लेकिन बस्तर के सत्यनारायण पाठक मानते हैं कि इससे लाभ तो कम होगा अलबत्ता ख़र्च बढेगा.

Image caption बीजेपी सरकार पर पहले से उठ रही मांगो की अनदेखी का आरोप लग रहा है.

सत्यनारायण पाठक का कहना है, "जब बस्तर एक ज़िला हुआ करता था तो एक ही कलेक्टर सारी योजनाओं की देखरेख करता था. अब सात ज़िले बन गए हैं यानी सात कलेक्टर, उनका अमला और उतना ही ख़र्च."

मगर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि नए ज़िले बनाने का फ़ैसला सरकार नें आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए किया है.

प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल का कहना है कि कई ऐसे इलाक़े हैं जहां नए ज़िले की मांग अरसे से चली आ रही है, मगर सरकार नें उनकी मांगों की अनदेखी की है.

पटेल के अनुसार, पत्थलगांव, गौरेला और समरी को अलग ज़िला बनाने की मांग लंबे अरसे से चली आ रही है. उनका आरोप है कि सरकार नें राजनीतिक कारणों से इन मांगों की अनदेखी की है.

ग्रामीण विकास मंत्री राम विचार नेताम मानते हैं कि कि नई व्यवस्था को प्रभावी बनाने में काफी समय लगेगा.

मगर वे भरोसा दिलाते हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सभी ज़िलों की व्यवस्था सही ढंग से चलने लगेगी.

लेकिन नए ज़िलों के बनने की डगर उतनी आसान भी नहीं है. बुनियादी ढांचे के अभाव के साथ-साथ अब दूसरे इलाक़ों से अलग ज़िले की मांग की उठती हुई मांगे सरकार के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं.

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