इतिहास के पन्नों में 23 जनवरी

अगर इतिहास के पन्नो को पलटकर देखें तो मालूम होगा कि आज के दिन यानि 23 जनवरी को ही अमरीका ने वियतनाम के साथ शांति प्रस्ताव की घोषणा की थी. राष्ट्रमंडल देशों के एक सम्मेलन में एक घोषणापत्र जारी हुआ जिसके बाद सदस्य देश दक्षिण अफ़्रीका के साथ व्यापारिक संबंध रख सकते थे.

1973: वियतनाम शांति समझौते की घोषणा

Image caption वियतनाम युद्ध का प्रभाव हाल तक अमरीकी समाज पर महसूस किया गया.

अमरीका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने टेलीवीजन पर आकर "सम्मान के साथ किए गए शांति समझौते" की घोषणा की.

अमरीका और हनोई से एक साथ जारी हुई विज्ञप्ति से ये बात साफ़ हो गई कि शांति समझौते पर पेरिस में हस्ताक्षर हुए थे, जिसके साथ ही अमरीका के द्वारा लड़ा गया सबसे लंबा युद्ध समाप्त हो गया.

युद्धविराम 27 जनवरी शनिवार के दिन से लागू हुआ था और इसकी देख-रेख कनाडा, पोलैंड, हंगरी और इंडोनेशिया के सैनिकों को मिलाकर अंतरराष्ट्रीय सैनिक दस्ते को करनी थी.

राष्ट्रपति के भाषण को व्हाइट हाउस से टीवी पर सीधा प्रसारित किया गया था.

दोनों मुल्कों के बीच तय हुई संधि की शर्तों के मुताबिक़ सभी युद्ध-बंदियों को दो महीनों के भीतर छोड़ दिया जाना था. अमरीकी फ़ौजों को भी वहां से इसी अवधि में पूरी तरह से वापसी करनी थी.

तीस दिनों के भीतर वियना में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाना था जिसमें शांति पर गांरटी दिया जाना था.

अमरीका सेना वियतनाम में लगभग एक दशक से मौजूद थीं. साल 1967 में वियतनाम में पांच लाख अमरीकी फ़ौजे मौजूद थीं.

971: ब्रिटेन ने पाया दक्षिण अफ़्रीका को हथियार बेचने का अधिकार

Image caption एक समय लगा कि संघ के कई देश इससे अलग हो जाएंगे.

सिंगापुर में हुए राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन में राष्ट्रमंडल के आदर्शों पर तैयार हो रहे घोषणापत्र के शब्दों में तब्दीली की गई थी ताकि अफ़्रीकी देश को हथियार की सप्लाई हो सके.

दरअसल ब्रिटेन दक्षिण अफ़्रीका को हथियार बेचना चाहता था, बावजूद इसके कि संयुक्त राष्ट्र ने इस तरह की बिक्री पर पाबंदी लगा रखी थी.

दूसरे अफ़्रीकी देश भी इस तरह के प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे.

पहले ज़ांबिया ने जो मसौदा पेश किया था उसके भीतर ब्रिटेन पर इस तरह की बिक्री को लेकर नैतिक ज़िम्मेदारी डाली गई थी लेकिन बाद में सभी 31 सदस्य देशों के द्वारा माने गए घोषणापत्र में हालांकि जातीय भेद-भाव की निंदा की गई थी लेकिन सभी देश अपने कार्यों के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार थे.

इस घोषणापत्र में कहा गया था कि वो भेद-भाव करने वाले किसी भी मुल्क के साथ संबंध रख सकते हैं अगर उन्हें लगता है कि इससे जातीय भेद-भाव को किसी तरह का बढ़ावा नहीं मिलेगा.

इस घोषणापत्र के तैयार होने के समय लग रहा था कि राष्ट्रमंडल में ही फूट पड़ जाएगी.

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