महातिर मोहम्मद की 'ग़रीब यूरोप' को सलाह

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Image caption महातिर मोहम्मद को मलेशिया की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का श्रेय दिया जाता है

पिछले कई दशकों से पश्चिमी देश पूर्व के देशों को उपदेश देते रहे हैं कि अर्थव्यवस्था को किस तरह चलाया जाए. लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं.

एशिया की नए उभरती अर्थव्यवस्थाएँ जहां एक तरफ स्थिर और अनुकूल नीति के साथ बिना किसी रुकावट के लगातार हो रहे विकास की परिचायक हैं तो वहीं यूरोप, अमरीका और जापान जैसे देश कर्ज़ की समस्या के कारण बहुत ही धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं.

मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद का संदेश सीधा सादा लेकिन सदमा पहुँचाने वाला है; "यूरोप को इस नई आर्थिक सच्चाई का खुलकर सामना करना चाहिए और पूर्व के देशों से सीख लेनी चाहिए."

उनके अनुसार ''यूरोप पहले काफ़ी धनी था लेकिन अब हालात बदल गए हैं और वो पहले से ग़रीब हो गए हैं.''

वो बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा,''एशिया में हम अपनी आय के दायरे में ही जीते हैं, जब हम ग़रीब होते हैं को ग़रीब लोगों की तरह ही जीते हैं और ये एक ऐसा सबक है जो यूरोप को हमसे सीखना चाहिए.''

राय से इंकार

डॉ महातिर मोहम्मद ऐसा कहने के हक़दार भी हैं.

अगर एशिया के किसी भी नेता को अपने देश की आर्थिक विकास की पृष्टभूमि तैयार करने का श्रेय जाता है तो वो डॉ.महातिर मोहम्मद ही हैं.

अपने दो दशक के कार्यकाल में महातिर मोहम्मद ने मलेशिया को एक निर्बल उपनिवेश से बदलकर अर्थव्यवस्था का अग्रणी बना दिया था.

वे मानते हैं कि यूरोप के नेता अभी भी सच्चाई को स्वीकार नहीं कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, "आप ये स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि अब आपके पास पैसा नहीं है इसलिए अब आप ग़रीब हो चुके हैं."

उन्होंने कहा,''इस समस्या का हल नोट छाप कर नहीं मिल सकता. नोट ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप छापते रह सकते हैं. उसे सहारा देने के लिए आपके पास या तो अच्छी अर्थव्यवस्था होनी चाहिए या फिर सोना.''

महातिर 86 साल के हो चुके हैं लेकिन वे अब भी काफ़ी मज़बूत और प्रभावशाली सोच के मालिक हैं

महातिर को ख़ासतौर पर ये लगता है कि यूरोपीय और पश्चिमी देशों को अपनी अर्थव्यवस्था का धीरे-धीरे पुनर्गठन कर वित्तीय क्षेत्रों पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए.

'मुद्रा' बनी हौव्वा'

महातिर मानते हैं कि सबसे बड़ी समस्या मुद्रा व्यवसाय है, वे मानते हैं कि नब्बे के दशक में एशिया में आए वित्तीय संकट के दौरान इसी की वजह से मलेशिया को काफ़ी नुकसान हुआ था.

वो साफ़ कहते हैं,''नोट या मुद्रा कोई वस्तु नहीं है, हम कॉफी के बीज बेच सकते हैं क्योंकि उसे पीस कर एक कप कॉफी बनाई जा सकती है लेकिन मुद्रा से हम कुछ नया नहीं गढ़ सकते, वो सिर्फ बैंक की किताबों में अंकित संख्या है जिससे सिर्फ बैंक की किताबों में ही व्यापार मुमकिन है इसलिए व्यापार के लिए आपके पास कुछ ठोस होना चाहिए तभी आपको मुनाफ़ा होगा.''

हालांकि महातिर ये कहने से भी नहीं चूकते कि उनकी सलाह मान लेने पर भी यूरोपीय देशों की आर्थिक हालत जल्द नहीं सुधरने वाली है.

उनके मुताबिक़,''अपनी खोई संपत्ति को वापस पाने के लिए आपको सालों-साल मेहनत करनी पड़ेगी ताकि अपनी क्षमता का दोबारा निर्माण कर दुनिया में फिर से अपनी पहचान बना सकें और पूर्व के देशों से मुक़ाबला कर सकें.''

वे मानते हैं कि यूरोपीय देशों में कामगारों को भुगतान अधिक करना पड़ता है और उनकी उत्पादकता कम होती है.

उनका कहना है कि ऐसा नहीं हो सकता कि आप ऐसी चीज़ों का उत्पादन करते रहें जो बिकने वाली न हों और फिर भी आपकी संपत्ति यथावत बनी रहे.

महातिर मानते हैं कि उनका ये संदेश काफ़ी कड़ा है लेकिन वे हँसते हुए ये भी कहते हैं, "पहले हमें भी ऐसे कड़े संदेश दिए जाते रहे हैं, याद है?"

''पहले आपने हमारी मुद्रा को अनदेखा किया था और हम ग़रीब हो गए थे. पहले सब कुछ यूरोप केंद्रित था पर अब थोड़ा कुछ एशिया केंद्रित होना चाहिए.''

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